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Home » उजड़े आशियाने में दर्द का मंजर… डालसा टीम के पहुंचते ही बदली किस्मत
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उजड़े आशियाने में दर्द का मंजर… डालसा टीम के पहुंचते ही बदली किस्मत

February 10, 2026No Comments3 Mins Read
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डालसा
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Ranchi (Pawan Thakur) : रांची के नगड़ी इलाके की उस सर्द रात की कल्पना कीजिए, जब ठंडी हवा हड्डियों तक चुभ रही थी। उस कंपकंपाती ठंड में टूटी हुई झोपड़ी के नीचे एक बुज़ुर्ग मां अपने मानसिक रूप से कमजोर बेटे को सीने से चिपकाए बैठी थी। न दरवाजा, न खिड़की, न पक्की छत। बस मां की हथेलियों की गर्मी और बेटे की बेकाबू सिसकियां। आसपास के लोग बताते हैं कि रात भर दोनों की आवाज़ें सुनाई देती थीं। ठंड से कांपते हुए, कभी रोते हुए, कभी चुप्पी में डूबे हुए। किसी ने खाना दे दिया तो खा लिया, नहीं तो पानी पीकर सो गए। यही उनकी दिनचर्या बन चुकी थी।

“मैं अपने बेटे को कहीं नहीं जाने दूंगी”

मां-बेटे की हालत की जानकारी डालसा तक पहुंची। न्यायामूर्ति-सह-कार्यपालक अध्यक्ष झालसा सुजीत नारायण प्रसाद के निर्देश पर, सदस्य सचिव कुमारी रंजना अस्थाना और डालसा रांची के अध्यक्ष अनिल कुमार मिश्रा-1 का देखरेख में एक टीम बनाई गई। टीम का नेतृत्व डालसा सचिव राकेश रौशन कर रहे थे। उनके साथ थे डिप्टी एलएडीसी राजेश कुमार सिन्हा, कर्मचारी मोनु कुमार, पीएलवी उमेश और चालक राजा वर्मा। जब डालसा सचिव राकेश रौशन अपनी टीम वहां पहुंचे तो उन्हें उम्मीद थी कि वे मदद करेंगे। लेकिन सामने एक डरी हुई मां थी, जिसे हर हाथ में खतरा दिख रहा था। वह बार-बार कह रही थी, “मैं अपने बेटे को कहीं नहीं जाने दूंगी… मुझे किसी पर भरोसा नहीं है।” उसके शब्दों में जिद कम, डर ज्यादा था। उसे लगता था कि इलाज के नाम पर उसका बेटा उससे छीन लिया जाएगा। शायद जिंदगी ने उसे भरोसा करना सिखाया ही नहीं था।

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मां का डर और घंटों की काउंसलिंग

डालसा सचिव राकेश रौशन और डिप्टी एलएडीसी राजेश कुमार सिन्हा ने वहीं जमीन पर बैठकर उससे बात की। कोई सरकारी रौब नहीं, बस समझाने की कोशिश। घंटों तक बातचीत चली। उसे बताया गया कि इलाज के बिना बेटे की हालत और बिगड़ सकती है, और मां-बेटे को अलग नहीं किया जाएगा। धीरे-धीरे उसकी आंखों में जमी शंका पिघलने लगी। आखिरकार उसने सिर हिलाया और कहा, “ठीक है, अगर आप लोग साथ रहेंगे तो ले जाइए।”

बेटे को इलाज, मां को छत

विक्षिप्त बेटे को रिनपास में भर्ती कराया गया। वहां उसका इलाज शुरू हुआ। दूसरी ओर, मां को कुलगू स्थित आदर्श वृद्धा आश्रम में ठहराया गया। जब वह आश्रम पहुंची तो लंबे समय बाद उसे पक्की छत के नीचे बैठने का मौका मिला। साफ बिस्तर, दो वक्त का खाना और आसपास हमउम्र महिलाएं। पहले दिन वह चुप रही। जैसे अभी भी यकीन नहीं हो रहा हो कि यह सब सच है। धीरे-धीरे उसने बाकी महिलाओं से बात करनी शुरू की। उसकी आंखों में अब भी बेटे की चिंता थी, लेकिन चेहरे पर पहले जैसी घबराहट नहीं थी।

सिस्टम की परतें भी खुलीं

निरीक्षण के दौरान यह भी सामने आया कि आश्रम परिसर के अटल क्लिनिक में दवाइयां तो भरी पड़ी हैं, लेकिन नियमित संचालन नहीं हो रहा। इस पर डालसा सचिव राकेश रौशन ने मौके से ही सिविल सर्जन से बात की और व्यवस्था दुरुस्त करने की मांग की। आश्वासन मिला कि जल्द ही क्लिनिक नियमित होगा। वहीं, आश्रम में रह रही एक और बुज़ुर्ग महिला की मानसिक हालत ठीक नहीं पाई गई। उसे भी इलाज के लिए रिनपास भेजा गया।

नगड़ी की वह बुज़ुर्ग मां अब सुरक्षित है। उसका बेटा इलाज के दौर से गुजर रहा है। खुले आसमान के नीचे ठिठुरती जिंदगी को अगर समय पर सहारा मिल जाए, तो उम्मीद भी जिंदा रहती है।

इसे भी पढ़ें : जिंदा भी तन्हा, मौ’त के बाद भी बेगानी… डालसा ने दिया आखिरी सम्मान

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