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Ranchi (Pawan Thakur) : रांची के हरमू मुक्तिधाम की शांत हवाओं में जब एक अकेली बूढ़ी बेसहारा महिला का अंतिम संस्कार हुआ, तो वहां मौजूद हर आंख नम थी। यह सिर्फ एक शव का अंतिम संस्कार नहीं था, बल्कि तीन दशक तक तन्हाई, उपेक्षा और टूटे हुए रिश्तों की कहानी का अंत था। यह कहानी है उस महिला की, जो साल 1997 से मानसिक बीमारी से जूझ रही थी और रिनपास में इलाजरत थी। इलाज के दौरान उसके अपने ही उसे वहां छोड़कर चले गए। समय बीतता गया, लेकिन कोई लौटकर नहीं आया।
अस्पताल में तन्हा गुजारे करीब 30 साल
बताया गया कि करीब तीन दशक पहले साल 1997 में जब महिला मानसिक बीमारी से पीड़ित हुई, तब उसके पति ने उसे इलाज के लिए रिनपास में भर्ती कराया। शुरुआत में यह कदम एक जिम्मेदार पति का प्रतीक लगा, लेकिन इलाज के बाद जो हुआ, वह रिश्तों की सच्चाई को बेनकाब कर गया। पति ने पत्नी को अस्पताल में भर्ती तो कराया, लेकिन उसके बाद कभी लौटकर देखने तक नहीं आया। न कोई हालचाल लिया, न कोई दवा-इलाज की चिंता की, न ही कभी उसे घर लाने की कोशिश की। समय बीतता गया, साल दर साल गुजरते रहे, लेकिन पत्नी अस्पताल के कमरों में अकेले ही जिंदगी से लड़ती रही। वहीं पति अपनी दुनिया में आगे बढ़ गया।
जब बेटे की एक झलक ने जगा दी थी उम्मीद
पति के बाद जिसने सबसे गहरी चोट दी, वह था बेटे का व्यवहार। कई सालों बाद अचानक महिला का बेटा मां से मिलने रिनपास पहुंचा। बेटे की शादी हो चुकी थी और उसकी पत्नी भी साथ आई थी। मां ने बेटे को देखकर जैसे नई जिंदगी पा ली। बेटे को बताया गया कि उसकी मां अब पूरी तरह ठीक हो चुकी है। वह पूरी तरह ठीक हो चुकी थी। उस रोज मां-बेटे घंटों साथ बैठे रहे, बातें हुईं, पुरानी यादें ताजा हुईं। बेटे ने कुछ कागजों पर मां से सिग्नेचर कराए और वादा किया कि अगले दिन वह उसे घर ले जाएगा। उस समय मां ने बिना सवाल किए बेटे पर भरोसा कर लिया। मां को लगा, “मेरा बेटा कभी मेरा बुरा नहीं चाहेगा।” लेकिन यह भरोसा ही उसकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई। बेटे ने अस्पताल प्रबंधन से भी कहा था कि मां को अगले रोज वहां से अपने साथ ले जायेगा। बेटा-बहू के साथ घर जाने बात से मां बेहद खुश थी। खुशी के मारे उस रात मां सो नहीं पाई। सुबह से ही अपने कपड़े और सामान बांधकर बेटे का इंतजार करती रही। हर आहट पर दरवाजे की ओर देखती रही। लेकिन वह बेटा कभी नहीं लौटा। फोन नहीं किया, संदेश नहीं भेजा, कोई सूचना नहीं दी। वह मां, जो वर्षों से इंतजार करना सीख चुकी थी, एक बार फिर ठगी गई।
उम्मीद टूटी, जिंदगी बिखर गई
दिन बीतता गया, शाम हुई, रात आई, लेकिन बेटा नहीं आया। यह इंतजार उसके दिल को तोड़ गया। उस दिन के बाद मां अंदर से पूरी तरह टूट गई। जिस बेटे को उसने जन्म दिया, पाला, बड़ा किया… वही उसे अकेला छोड़ गया। वह गहरे सदमे में चली गई। इस सदमे ने उसकी मानसिक स्थिति को और बिगाड़ दिया। वह चुप रहने लगी, लोगों से कटने लगी, खुद में सिमट गई। डॉक्टरों के अनुसार, यह भावनात्मक आघात ही उसकी सेहत गिरने का सबसे बड़ा कारण बना। धीरे-धीरे उसकी हालत बिगड़ती चली गई और अंततः रिनपास में ही उसने दम तोड़ दिया। मां का अंतिम समय भी उसी अस्पताल के कमरे में बीता, जहां वह सालों से अकेली और तन्हा रह रही थी।
मौत के बाद भी अपनों की बेरुखी
सबसे दर्दनाक दृश्य तब सामने आया, जब महिला की मौत हो गई। रिनपास प्रशासन ने परिजनों को फोन किया। लेकिन न पति आया और न बेटा। बल्कि परिजनों ने शव लेने तक से इनकार कर दिया। उसे आखिरी विदाई देने भी कोई तैयार नहीं था। यह वही परिवार था, जिसके लिए उसने पूरी जिंदगी कुर्बान कर दी थी। अस्पताल प्रशासन ने यह जानकारी रांची के डालसा यानी जिला विधिक सेवा प्राधिकार को दी।
खबर मिलते ही एक्टिव हुई डालसा
न्यायामूर्ति सह झालसा के कार्यपालक अध्यक्ष सुजीत नारायण प्रसाद तक बात पहुंचाई गयी। उनके दिशा निर्देश पर झालसा की सदस्य सचिव कुमारी रंजना अस्थाना और न्यायायुक्त सह डालसा रांची के अध्यक्ष अनिल कुमार मिश्रा-1 ने आगे का टास्क डालसा सचिव राकेश रौशन को सौंपा। डालसा सचिव राकेश रौशन के कानों तक जब यह कहानी पहुंची, तब उनका कलेजा फट गया। उन्होंने पीएलवी भारती शाहदेव और अपनी टीम को साथ लिया और पहुंच गये रिनपास। वहां, अस्पताल प्रबंधन से एक-एक बात जाना और फिर एलवी भारती शाहदेव के साथ मिलकर लगातार दो दिनों तक परिजनों से संपर्क किया। काउंसलिंग हुई, समझाया गया, रिश्तों की याद दिलाई गई, इंसानियत का वास्ता दिया गया। कई कोशिशों के बाद मृतिका के चचेरे भाई रांची आने को तैयार हुए और उस अभागिन महिला की लाश लेने रांची पहुंचे। वे हजारीबाग में रहते हैं।
सम्मान के साथ मिली अंतिम विदाई
डालसा सचिव राकेश रौशन की देखरेख में हरमू मुक्तिधाम में पूरे सम्मान के साथ महिला का अंतिम संस्कार किया गया। राकेश रौशन ने कहा कि संस्था सिर्फ कानूनी मदद तक सीमित नहीं है, बल्कि जरूरतमंदों और बेसहारा लोगों के जीवन में सहारा बनने का प्रयास करती है। उन्होंने बताया कि कोई भी जरूरतमंद व्यक्ति नालसा के टोल फ्री नंबर 15100 पर संपर्क कर सहायता ले सकता है।
डालसा ने दिखाया कि इंसानियत अब भी जिंदा है
जहां पति और बेटा फेल हो गए, वहां डालसा आगे आया। जिस मां को अपनों ने छोड़ दिया था, उसे संस्था ने अपनाया। अंतिम संस्कार के समय डालसा के सदस्य ही उसके अपने बनकर खड़े थे। उन्होंने साबित किया कि खून के रिश्ते ही नहीं, इंसानियत भी परिवार बन सकती है। उस समय वहां मौजूद लोग सिर्फ एक संस्था नहीं, बल्कि इंसानियत की जीत देख रहे थे।
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