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Patna : किसी भी समाज की तरक्की का रास्ता स्कूल के उसी दरवाजे से होकर गुजरता है, जहां एक बच्चा हाथ में बस्ता लिए पहली बार कदम रखता है। लेकिन बरसों से बिहार के सरकारी स्कूलों की पहचान क्या रही? टूटे-फूटे बेंच, टपकती छतें, बंद पड़े शौचालय और एक ही कमरे में कई कक्षाओं के बच्चों का बैठना। आज यह तस्वीर धीरे-धीरे ही सही, मगर ठोस तरीके से बदलती नजर आ रही है। सीएम सम्राट चौधरी की अगुवाई में सरकार ने अब दिखावे से आगे बढ़कर सीधे उन बुनियादी जरूरतों को सुदृढ़ किया है, जो किसी भी स्कूल की रीढ़ होती हैं। शिक्षा विभाग ने सिर्फ एक महीने के भीतर 1627 विकास योजनाओं को धरातल पर उतारकर यह साबित किया है कि अगर नीयत साफ हो, तो सरकारी मशीनरी भी तेजी से काम कर सकती है।
फाइलों से बाहर निकलकर जमीन पर उतरीं योजनाएं
सरकारी महकमों में योजनाएं अक्सर फाइलों और कागजों में दौड़ती रहती हैं, लेकिन इस बार मामला अलग दिखा। सीएम सम्राट चौधरी के स्पष्ट निर्देश और शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी की कड़ी निगरानी का ही नतीजा है कि समग्र शिक्षा अभियान और पीएम श्री के तहत अटके पड़े प्रोजेक्ट्स ने अचानक रफ्तार पकड़ ली। अक्टूबर के शुरुआती हफ्तों में ही 1627 काम पूरे करा लिए गए, जबकि 3312 योजनाओं पर युद्धस्तर पर काम जारी है। काम पूरा होने के बाद एजेंसियों को बिना किसी लालफीताशाही के 45 करोड़ रुपये का भुगतान भी कर दिया गया, ताकि निर्माण कार्य में कोई रुकावट न आए।
कमरों की तंगी खत्म, अब लैब और कंप्यूटर का दौर
सरकारी स्कूलों में अक्सर शिकायत रहती थी कि बच्चे तो आ गए, लेकिन उनके बैठने की जगह नहीं है। बिहार राज्य शैक्षणिक आधारभूत संरचना विकास निगम लिमिटेड ने इसी परेशानी को सबसे पहले सुलझाया। राज्य भर में रिकॉर्ड 221 नए अतिरिक्त क्लासरूम तैयार किए गए हैं, जिस पर करीब 9 करोड़ 73 लाख रुपये खर्च हुए।
इतना ही नहीं, पढ़ाई को सिर्फ किताबों तक सीमित न रखकर उसे आधुनिक बनाने की दिशा में भी कदम बढ़े हैं। दो नई साइंस लैब और दो कंबाइंड लैब-कम-क्लासरूम तैयार किए गए हैं, ताकि गांव का बच्चा भी परखनली पकड़कर विज्ञान को समझ सके। इसके साथ ही बच्चों में ज्ञान और तकनीक की समझ बढ़ाने के लिए लाइब्रेरी रूम, आर्ट-क्राफ्ट और कंप्यूटर सेंटर भी तैयार किए गए हैं। पुराने और जर्जर भवनों की मरम्मत कराकर उन्हें नया रूप दिया गया है।
बेटियों के मान-सम्मान और स्वास्थ्य की पुख्ता व्यवस्था
शिक्षा व्यवस्था में सबसे संवेदनशील और जरूरी मुद्दा हमेशा से साफ-सफाई और शौचालयों का रहा है। कई बार सिर्फ इसलिए बेटियां स्कूल छोड़ देती थीं क्योंकि वहां उनके लिए अलग और सुरक्षित शौचालय नहीं होते थे। सरकार ने इस जमीनी हकीकत को समझा और प्राथमिकता के आधार पर काम कराया। राज्य के विद्यालयों में 54 संयुक्त शौचालय, 12 विशेष बालिका शौचालय और 7 बालक शौचालय बनकर तैयार हो चुके हैं, जबकि 39 अन्य शौचालयों का काम भी पूरा कर लिया गया है। बेटियों के लिए अलग टॉयलेट की यह व्यवस्था स्कूल छोड़ने (ड्रॉप आउट) की दर को थामने में सबसे बड़ा हथियार साबित होगी।
मजबूत इरादे, बदलता कल
सीएम सम्राट चौधरी के काम करने का अंदाज हमेशा से थोड़ा अलग रहा है। वे लंबी-चौड़ी घोषणाओं के बजाय सीधे परिणामों पर भरोसा करते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में जिस तत्परता से लंबित योजनाओं की समीक्षा कर उन्हें पूरा कराया गया है, वह उनकी मजबूत प्रशासनिक पकड़ और राज्य के भविष्य के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाता है। स्कूलों में रंग-रोगन, पक्के कमरे, सुरक्षित टॉयलेट और हाथ में कंप्यूटर का माउस… यह बदलाव केवल ईंट-सीमेंट का नहीं है, बल्कि बिहार के उन लाखों गरीब बच्चों के सपनों को मजबूती देने का प्रयास है जो हर सुबह एक उम्मीद के साथ स्कूल की घंटी बजने का इंतजार करते हैं।
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