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Ranchi : झारखंड अलग राज्य आंदोलन के महानायक और आदिवासियों, गरीबों तथा वंचितों के अधिकारों के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले दिवंगत शिबू सोरेन को देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से नवाजा गया है। राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक विशेष अलंकरण समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शिबू सोरेन के ऐतिहासिक योगदान को नमन करते हुए यह सम्मान प्रदान किया। केंद्र सरकार ने इस साल गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर उन्हें मरणोपरांत इस सम्मान के लिए चुना था। शिबू सोरेन को यह गौरव लोक कल्याण, सामाजिक न्याय और आदिवासी समाज के सशक्तीकरण के लिए किए गए उनके कार्यों के लिए दिया गया है। राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस गरिमामयी समारोह के दौरान शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन ने इस सम्मान को ग्रहण किया। इस भावुक और ऐतिहासिक पल के दौरान शिबू सोरेन की बहू और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन भी वहां मौजूद रहीं। इससे पहले झारखंड विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से शिबू सोरेन को देश का सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ देने की मांग भी की थी। इस सम्मान की घोषणा के बाद से ही पूरे झारखंड में खुशी की लहर है। राज्य के विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने इसे झारखंड की अस्मिता और आदिवासी गौरव के लिए एक बड़ा दिन बताया है।
जल, जंगल और जमीन को बनाया आंदोलन का मुख्य आधार
गरीबों की आवाज बुलंद करने वाले शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था। 81 वर्ष की आयु में, पिछले साल 4 अगस्त 2025 को दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में इलाज के दौरान उनका निधन हो गया था। वे लंबे समय से किडनी की बीमारी से जूझ रहे थे। शिबू सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक नेताओं में से एक थे और उन्होंने तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की कमान संभाली। वे केंद्र की यूपीए सरकार में कोयला मंत्री भी रहे, हालांकि बाद में चिरूडीह मामले में नाम आने की वजह से उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया था।
शिबू सोरेन ने बचपन से ही आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार, जमींदारों के शोषण और विस्थापन के दर्द को बहुत करीब से देखा था। इसी दर्द ने उनके आगे के जीवन की दिशा तय की। युवावस्था में ही वे आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई में कूद पड़े। साल 1970 में उन्होंने ‘धान काटो आंदोलन’ की शुरुआत की, जिसके तहत उन्होंने महाजनों और जमींदारों के खिलाफ मोर्चा खोलकर गरीबों की हड़पी गई जमीनों से सामूहिक ताकत के बल पर फसल कटवाई। 1980 के दशक में जब विकास और वन कानूनों के नाम पर आदिवासियों से उनकी जमीनें छीनी जा रही थीं, तब उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को एकजुट किया और नारा दिया कि जल, जंगल और जमीन ही आदिवासियों के अस्तित्व का असली आधार हैं। 1990 के दशक में उन्होंने संसद में यह कड़ा सवाल भी उठाया कि जो क्षेत्र खनिज संपदा से इतना अमीर है, वहां का आदिवासी आखिर इतना गरीब क्यों है? उनके इसी लंबे संघर्ष की बदौलत 15 नवंबर 2000 को अलग झारखंड राज्य का सपना सच हो पाया।
समाज सुधार के वे 5 बड़े काम जिन्होंने शिबू सोरेन को बनाया अमर
शिबू सोरेन का मानना था कि सिर्फ राजनीतिक आजादी काफी नहीं है, बल्कि समाज के भीतर सुधार होना भी बेहद जरूरी है। उनके पांच प्रमुख कार्य आज भी मिसाल माने जाते हैं:
जमीन की मुक्ति और अबुआ राज : आदिवासियों की जमीन वापस दिलाने और महिलाओं के सम्मान की रक्षा के लिए उन्होंने ‘आदिवासी सुधार समिति’ का गठन किया। महाजनों के कब्जे से आदिवासियों की जमीनों को मुक्त कराकर उन्होंने भगवान बिरसा मुंडा के ‘अबुआ दिशुम अबुआ राज’ (हमारा देश, हमारा राज) के सपने को जमीन पर उतारा।
नशे के खिलाफ कड़ा अभियान : गुरुजी खुद पूरी तरह शाकाहारी थे और नशे के सख्त खिलाफ थे। वे गांव-गांव जाकर लोगों को समझाते थे कि शराब और हड़िया से दूर रहें। उनका कहना था कि महाजन आदिवासियों को शराब पिलाकर और कागजों पर अंगूठा लगवाकर उनकी जमीनें छीन लेते हैं। समाज को सुधारने के लिए वे कई बार शराब पीने वालों को सजा भी देते थे।
सभी धर्मों को साथ लेकर चलना : झारखंड आंदोलन को उन्होंने कभी किसी एक वर्ग या धर्म तक सीमित नहीं रहने दिया। उनका मानना था कि एकजुटता से ही अलग राज्य मिल सकता है। यही वजह थी कि उनके आंदोलन में हिंदू, मुस्लिम, सरना, ईसाई, सिख और जैन समाज के लोगों ने कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया।
पर्यावरण और जंगलों की रक्षा : जंगलों में लंबा वक्त बिताने के कारण गुरुजी को पेड़-पौधों से गहरा लगाव था। उनके आंदोलन की शुरुआत ही जंगलों को काटने वाले ठेकेदारों के विरोध से हुई थी। बाद में उन्होंने टुंडी के पास पलमा में अपना आश्रम बनाया और लोगों को ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया।
शिक्षा की अलख और रात्रि पाठशाला : उन्होंने देखा कि अनपढ़ होने के कारण सीधे-साधे आदिवासियों को जमींदार आसानी से बहका देते हैं। इस समस्या को दूर करने के लिए उन्होंने जंगलों और पहाड़ी इलाकों में ‘रात्रि पाठशाला’ की शुरुआत की, जहां वे खुद लोगों को अक्षर ज्ञान देते थे ताकि कोई उन्हें ठग न सके।
पूरे झारखंड में फैली थी गुरुजी की कर्मभूमि
शिबू सोरेन का जुड़ाव किसी एक क्षेत्र से नहीं बल्कि पूरे झारखंड के गांवों से था। राज्य के अलग-अलग हिस्सों में उनके संघर्ष की कहानियां आज भी गूंजती हैं:
कोल्हान की धरती : यह क्षेत्र गुरुजी की मुख्य कर्मभूमि रहा। आंदोलन के दिनों में जब पुलिस उनके पीछे होती थी, तो वे समर्थकों के साथ इसी इलाके के जंगलों और गांवों में शरण लेते थे।
बोकारो से दिली लगाव : बोकारो के ग्रामीण इलाकों में वे बिल्कुल आम किसान की तरह रहते थे। सुबह उठकर खेतों में घूमना, पेड़-पौधों की देखभाल करना, मवेशियों के चारे का ध्यान रखना और सब्जियों की क्यारियों को देखना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था।
धनबाद में नाम पड़ा ‘गुरुजी’ : टुंडी प्रखंड के पोखरिया गांव में जब बिजली नहीं थी, तब शिबू सोरेन लालटेन की रोशनी में पुरुषों और महिलाओं को पढ़ाते थे। वे लोगों को सामूहिक खेती और पशुपालन के तरीके सिखाते थे। इसी निस्वार्थ सेवा के कारण लोगों ने उन्हें ‘गुरुजी’ का आदरणीय नाम दिया।
गिरिडीह की सामाजिक क्रांति : साल 1979 में जब आंदोलन के बड़े नेता विनोद बिहारी महतो गिरिडीह जेल में बंद थे, तब शिबू सोरेन ने ऐतिहासिक ऐलान किया था कि वे जेल की दीवारें ढहा देंगे। इस घटना ने पूरे इलाके में एक बड़ी सामाजिक क्रांति का रूप ले लिया था।
जामताड़ा में महाजनी प्रथा का अंत : जामताड़ा के चिरूडीह गांव से उन्होंने सूदखोरों और महाजनों के खिलाफ बिगुल फूंका था। 1975 के इस आंदोलन ने झारखंड की पूरी राजनीतिक दिशा को बदलकर रख दिया।
दुमका का जन दरबार : दुमका को उन्होंने अपने आंदोलन का मुख्य केंद्र बनाया था। यहां आने पर वे किसी बड़े दफ्तर में नहीं, बल्कि एक साधारण शेड के नीचे बैठकर आम लोगों और कार्यकर्ताओं की शिकायतें सुनते थे और मौके पर ही न्याय करते थे। फौरन इंसाफ करने की इसी शैली और आदिवासियों के हक के लिए हमेशा खड़े रहने की वजह से लोग उन्हें ‘दिशोम गुरु’ (देश के गुरु) कहने लगे।
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