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Garhwa (Nityanand Dubey) : यह कहानी सिर्फ सरकारी योजनाओं की नहीं, बल्कि उन गरीब मजदूरों की है जिनके लिए “दाल-भात केंद्र” किसी राहत की तरह बनाए गए थे। दिनभर की मेहनत के बाद कुछ रुपए में भरपेट भोजन उनका हक है, लेकिन गुरुवार को जब सदर अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीएम) संजय कुमार ने अचानक तीन प्रखंडों – मझिआंव, कांडी और बरडीहा – का दौरा किया, तो तस्वीर कुछ और ही निकली।
खाली बर्तन, बुझा चूल्हा और भूखे पेट की कहानी
मझिआंव प्रखंड में आपूर्ति गोदाम के पास स्थित दाल-भात केंद्र का दृश्य निराशाजनक था। एक कोने में आधा किलो बेसन की कढ़ी पक रही थी, पास में चार किलो चावल पड़ा था। केंद्र संचालिका गीता देवी बोलीं कि उन्हें हर महीने नौ क्विंटल राशन मिलता है, लेकिन वहां न कोई ग्राहक था, न कोई कामकाज का माहौल। जब एसडीएम ने सवाल किया कि बाकी राशन कहां है, तो जवाबों में चुप्पी थी। बरडीहा में स्थिति इससे भी खराब मिली। प्रखंड कार्यालय के दरवाजे पर बना केंद्र निरीक्षण के वक्त बंद था। ग्रामीणों ने कहा, “यह तो ज्यादातर दिनों में बंद ही रहता है।” सवाल यह था कि जब दफ्तर के ठीक सामने यह हालत है, तो गांवों में क्या हाल होगा?
कांडी में हीटर पर पकता ‘सरकारी खाना’
कांडी प्रखंड कार्यालय के सामने जो दाल-भात केंद्र चला रहा था, वहां का दृश्य जैसे सरकारी मज़ाक बन गया था। चूल्हे की जगह एक छोटा इलेक्ट्रिक हीटर था, बड़े बर्तन गायब थे, और भोजन का कोई अता-पता नहीं। एसडीएम ने मौके पर मौजूद बीडीओ राकेश सहाय से पूछा कि गरीबों के लिए बनी इस योजना की यह हालत क्यों है। जवाब में सिर्फ औपचारिकता मिली।
एसडीएम की सख्ती, लापरवाही पर कार्रवाई तय
संजय कुमार ने कहा, “ये केंद्र मजदूरों और राहगीरों के लिए हैं। यह राहत नहीं, अधिकार है। लेकिन यहां तो मनमानी साफ दिख रही है।” उन्होंने संचालकों और आपूर्तिकर्ताओं पर कार्रवाई का निर्देश दिया और सभी बीडीओ को आदेश दिया कि केंद्रों का नियमित निरीक्षण करें ताकि कोई भूखा न लौटे।
कांडी में अवैध क्लिनिक पर ताला
इसी दौरे में एसडीएम कांडी स्वास्थ्य केंद्र के पास पहुंचे, जहां उन्हें एक बिना नाम का क्लिनिक खुला मिला। पूछताछ में पता चला कि इसे एक इंटर पास युवक चला रहा था। कोई लाइसेंस नहीं, कोई डिग्री नहीं – फिर भी मरीजों की जांच हो रही थी। एसडीएम ने मौके पर ही क्लिनिक को बंद कराया और कहा, “इस तरह की लापरवाही जानलेवा है, प्रशासन ऐसी गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं करेगा।”
गरीबों के लिए बनी योजनाएं, लेकिन निगरानी कहां?
गढ़वा में यह दौरा सिर्फ निरीक्षण नहीं, एक आईना था, जिसमें सरकारी सिस्टम की दरारें साफ दिखीं। जहां गरीब को दो वक्त की रोटी मिलनी थी, वहां बर्तन खाली हैं। और जहां इलाज का भरोसा होना चाहिए, वहां झोलाछाप डॉक्टर बैठे हैं। एसडीएम की कार्रवाई से फिलहाल हलचल मची है, लेकिन असली सवाल अब भी वही है… क्या योजनाएं सिर्फ कागज पर चलेंगी, या सच में गरीब की थाली तक पहुंचेंगी?
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