अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :
Ranchi : दावोस की बर्फीली वादियों में जब दुनिया के ताकतवर देश अपनी अर्थव्यवस्था और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा करेंगे, तब पहली बार झारखंड की आवाज भी उस मंच पर गूंजेगी। एक ऐसा राज्य, जिसकी पहचान अब तक जंगल, खनिज और संघर्षों से जुड़ी रही है, अब वैश्विक विकास संवाद का हिस्सा बनने जा रहा है।
25 साल का सफर, एक नई पहचान की तलाश
झारखंड के लिए यह केवल एक अंतरराष्ट्रीय बैठक में शामिल होना नहीं है। यह राज्य बनने के 25 वर्षों की उस यात्रा का पड़ाव है, जहां सपने, चुनौतियां और उम्मीदें एक साथ खड़ी दिखती हैं। अलग राज्य की मांग के पीछे जिन लोगों ने जंगल, जमीन और पहचान की बात की थी, उनके सपनों को लेकर आज झारखंड दुनिया के सामने खड़ा है।
मुख्यमंत्री के साथ जाएगी राज्य की कहानी
विश्व आर्थिक मंच में झारखंड के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन करेंगे। उनके साथ केवल फाइलें और आंकड़े नहीं होंगे, बल्कि उन गांवों की कहानियां भी होंगी जहां विकास और प्रकृति साथ-साथ चलने की कोशिश कर रहे हैं। यह प्रस्तुति बताएगी कि कैसे आदिवासी समाज, वन संसाधन और आधुनिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ा जा सकता है।
प्रकृति के साथ विकास का संदेश
दावोस में झारखंड अपना विषय रखेगा, “प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण विकास।” यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि उस राज्य की जरूरत है जहां जंगल जीवन हैं और खनिज अर्थव्यवस्था की रीढ़। झारखंड यह दिखाना चाहता है कि विकास का रास्ता प्रकृति को नुकसान पहुंचाकर नहीं, बल्कि उसे साथ लेकर ही तय किया जा सकता है।
महिलाएं, ऊर्जा और नई संभावनाएं
झारखंड की भागीदारी का एक अहम पहलू महिला सशक्तिकरण है। स्वयं सहायता समूहों से लेकर स्थानीय उद्यम तक, राज्य की महिलाएं धीरे-धीरे आर्थिक बदलाव की धुरी बन रही हैं। इसके साथ ही इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, नवीकरणीय ऊर्जा, वन आधारित आजीविका और जैव-अर्थव्यवस्था जैसे विषयों पर भी झारखंड अपनी बात रखेगा।
निवेश से पहले भरोसे की बात
दावोस में होने वाली बैठकों का मकसद केवल निवेश बुलाना नहीं है, बल्कि भरोसे का पुल बनाना है। झारखंड सरकार बहुपक्षीय संस्थानों, निजी कंपनियों और शैक्षणिक संस्थानों के साथ साझेदारी पर जोर देगी, ताकि विकास स्थानीय लोगों के जीवन में वास्तविक बदलाव ला सके।
गांव से ग्लोबल मंच तक की उम्मीद
झारखंड की यह पहली दावोस यात्रा उन युवाओं के लिए भी उम्मीद लेकर जा रही है, जो अपने गांव में रहकर बेहतर भविष्य का सपना देखते हैं। यह संकेत है कि राज्य अब केवल अपनी समस्याओं की पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि समाधान का हिस्सा बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
इसे भी पढ़ें : दावोस में पहली बार गूंजेगा ‘जोहार’, सीएम हेमंत करेंगे झारखंड का नेतृत्व



