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Home » हर्ष आनंद : चोट, संघर्ष और पापा के भरोसे से बना झारखंड का पावरलिफ्टिंग हीरो
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हर्ष आनंद : चोट, संघर्ष और पापा के भरोसे से बना झारखंड का पावरलिफ्टिंग हीरो

February 14, 2026No Comments4 Mins Read
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हर्ष आनंद
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Ranchi : नोएडा में हुई WPC नेशनल इक्विप्ड पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में जब हर्ष आनंद ने 75 किलो ओपन कैटेगरी में एक गोल्ड और दो सिल्वर मेडल जीते, तो मंच पर खड़े उस खिलाड़ी के चेहरे पर सिर्फ जीत की चमक नहीं थी। उसमें बीते कई सालों की मेहनत, दर्द और भरोसे की कहानी छिपी थी। यह कहानी सिर्फ एक एथलीट की नहीं है। यह एक बेटे और पिता के रिश्ते की, संघर्ष और वापसी की, और उस भरोसे की कहानी है जो मुश्किल समय में टूटने नहीं देता।

पांचवां स्थान… और वहीं से शुरू हुआ असली सफर

साल 2021… खूंटी में स्टेट चैंपियनशिप। पहली बार बड़े मंच पर उतरे हर्ष को पांचवां स्थान मिला। कई लोग इसे सामान्य परिणाम मानते, लेकिन हर्ष के लिए यह अंदर से झकझोर देने वाला था। उन्होंने बाद में अपने करीबियों से कहा था, “हार से ज्यादा यह बात लगी कि मैं और बेहतर कर सकता था।” यही बेचैनी उनकी ताकत बन गई। अगले ही साल स्टेट में तीसरा स्थान, फिर हावड़ा में पहले नेशनल में चौथा स्थान। धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास लौटने लगा। और फिर मेडल का सिलसिला शुरू हो गया।

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जब कंधा और जेब… दोनों दे गये जवाब

खेल की दुनिया में चोट सिर्फ शरीर को नहीं, मन को भी तोड़ती है। इंटरनेशनल एशियन और वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए चयन हुआ ही था कि कंधे और पीठ की गंभीर चोट ने उन्हें रोक दिया। डॉक्टरों ने आराम की सलाह दी। ट्रेनिंग छूटी। उधर आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं थी। बड़े टूर्नामेंट में भाग लेना आसान नहीं होता। यात्रा, ट्रेनिंग, डाइट, उपकरण… सब कुछ खर्च मांगता है। यहीं पर पिता अशोक कुमार गुप्ता आगे आए। खुद पावरलिफ्टर रह चुके और ‘झारखंड सेवा रत्न’ से सम्मानित, उन्होंने बेटे से सिर्फ एक बात कही, “तुम खेलो, बाकी मैं देख लूंगा।” कहते हैं, खिलाड़ी की सबसे बड़ी ताकत उसका सपोर्ट सिस्टम होता है। हर्ष के लिए वह उनके पिता थे।

वापसी ऐसी कि दुनिया ने नोटिस लिया

बेंगलुरु में आयोजित एशियन पावरलिफ्टिंग में हर्ष ने दो गोल्ड मेडल जीतकर जब मंच पर तिरंगा लहराया, तो यह सिर्फ जीत नहीं थी। यह उस दौर का जवाब था जब लोग पूछते थे, “अब आगे क्या?” चोट से उबरकर लौटना आसान नहीं होता। लेकिन हर्ष ने खुद को फिर से गढ़ा।

दिन में आईटी प्रोफेशनल, शाम को एथलीट

हैदराबाद की कंपनी MediaMint में एड ऑपरेशन से जुड़ा उनका करियर भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं था। कॉरपोरेट जीवन की भागदौड़, डेडलाइन और मीटिंग्स के बीच ट्रेनिंग के लिए समय निकालना किसी संतुलन कला से कम नहीं। कई बार ऑफिस से लौटकर देर रात तक जिम में पसीना बहाना, डाइट पर सख्ती से टिके रहना और छुट्टियों को भी ट्रेनिंग कैंप में बदल देना… यही उनकी दिनचर्या बन गई। उनके दोस्त कहते हैं, “हर्ष के लिए जिम सिर्फ जगह नहीं, दूसरा घर है।”

खिलाड़ी से आगे बढ़कर मार्गदर्शक

साल 2024 में World Powerlifting Congress इंडिया के अध्यक्ष दलजीत सिंह ने उनकी नेतृत्व क्षमता को देखते हुए उन्हें झारखंड पावरलिफ्टिंग का महासचिव बनाया। जिम्मेदारी मिलते ही उन्होंने ठान लिया कि जो संघर्ष उन्होंने देखा, वह अगली पीढ़ी को कम झेलना पड़े। गिरिडीह, कोडरमा और बोकारो में प्रतियोगिताओं का आयोजन कर उन्होंने छोटे शहरों के खिलाड़ियों को मंच दिया। हाल ही में नोएडा नेशनल में वे 13 खिलाड़ियों के कोच भी थे। 99 प्रतिशत सफलता दर अपने आप में बताती है कि वे सिर्फ खुद नहीं जीत रहे, बल्कि दूसरों को भी जीतना सिखा रहे हैं।

जीत का असली मतलब

नोएडा में जीते गए तीन मेडल उनकी उपलब्धियों की सूची में जुड़ गए हैं। लेकिन अगर आप हर्ष से पूछें कि सबसे बड़ी जीत क्या है, तो शायद वे कहेंगे, “पापा का भरोसा।” आज झारखंड में पावरलिफ्टिंग का नाम जब लिया जाता है, तो हर्ष आनंद का जिक्र जरूर होता है। लेकिन उनकी कहानी मेडल से बड़ी है। यह कहानी है उस जिद की, जो पांचवें स्थान से शुरू होकर नेशनल मंच तक पहुंची। और शायद यह सफर अभी शुरू ही हुआ है।

इसे भी पढ़ें : आतंक और रंगदारी के नेटवर्क पर NIA का बड़ा वार

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