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Home » “अब घर नहीं जाना”… अपनों ने छोड़ा, वक्त ने तोड़ा… 30 साल बाद भी जिंदा है दर्द
Headlines

“अब घर नहीं जाना”… अपनों ने छोड़ा, वक्त ने तोड़ा… 30 साल बाद भी जिंदा है दर्द

February 19, 2026No Comments4 Mins Read
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महिला की तस्वीर AI द्वारा बनाई गयी है
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Ranchi : दोपहर का वक्त था। वार्ड के बाहर हल्की धूप थी, भीतर सन्नाटा। लोहे के पुराने दरवाजे के पास एक बूढ़ी महिला कुर्सी पर बैठी थीं। नजरें दरवाजे पर टिकी हुईं, जैसे अभी कोई आएगा। जब डालसा सचिव राकेश रौशन ने पूछा, “घर चलेंगी?” उन्होंने धीमे से हाथ जोड़ लिए। आवाज भर्रा गई, वह बोलीं- “अब मैं घर नहीं जाना चाहती… जब समय था, तब कोई लेने नहीं आया।” यह दृश्य था रांची के सीआईपी यानी केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान का, जहां निरीक्षण करने पहुंची थी डालसा रांची की टीम। यह निरीक्षण न्यायामूर्ति सह झालसा के कार्यपालक अध्यक्ष सुजित नारायण प्रसाद के दिशा निर्देश पर सदस्य सचिव कुमारी रंजना अस्थाना एवं रांची डालसा के अध्यक्ष न्यायायुक्त अनिल कुमार मिश्रा-1 के मार्गदर्शन में डालसा सचिव राकेश रौशन ने खुद टीम के साथ किया। उनकी टीम में सीआईपी के निदेशक बीके चौधरी, एलएडीसी डिप्टी राजेश कुमार सिन्हा और न्यायमित्र भारती शाहदेव शामिल थी। निरीक्षण के दरम्यान कई ऐसी कहानियां सामने आईं, जो इलाज से आगे जाकर रिश्तों की कसौटी पर सवाल खड़े करती हैं।

ठीक हो गए, फिर भी कोई लेने नहीं आया

निरीक्षण टीम को ऐसे 47 मरीज मिले, जो अब चिकित्सकीय तौर पर ठीक हो चुके हैं। दवाइयां कम हो चुकी हैं, बातचीत सामान्य है, रोजमर्रा के काम खुद कर लेते हैं। लेकिन घर का दरवाजा उनके लिए अब भी बंद है। एक वार्ड में बैठी बूढ़ी महिला ने बताया कि उन्हें करीब 20 साल पहले यहां भर्ती कराया गया था। उस वक्त वह जवान थीं, मां-बाप जिंदा थे। उन्होंने कहा… “कभी मिलने नहीं आए।” फिर थोड़ी देर चुप रहीं। “अब मैं बूढ़ी हो गई हूं। अब क्यों जाऊं?” उनकी आंखों में शिकायत कम, थकान ज्यादा थी।

20 साल की उम्र में छोड़ी गई, 80 की होकर भी उम्मीद बाकी

एक और महिला की कहानी अलग है, लेकिन दर्द वही। परिवार ने उन्हें 20 साल की उम्र में अस्पताल में छोड़ दिया था। आज उनकी उम्र 80 साल के करीब है। सफेद बाल, झुकी कमर, पर आंखों में अब भी उम्मीद की चमक। वह रोज वार्ड के बाहर बैठती हैं। किसी के कदमों की आहट सुनती हैं तो चेहरा दरवाजे की तरफ घूम जाता है। वह कहती हैं “आएंगे… जरूर आएंगे।”  इंतजार ने जैसे उनकी पूरी उम्र अपने भीतर समेट ली है।

इलाज से बड़ी चुनौती… अपनापन

डालसा सचिव राकेश रौशन ने निरीक्षण के दरम्यान अस्पताल प्रबंधन से बात की, वार्डों का दौरा किया और मरीजों से सीधे बातचीत की। मेडिकल रिपोर्ट कहती है कि कई मरीज अब सामान्य जीवन जी सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या समाज उन्हें फिर से अपनाने को तैयार है? अस्पताल के एक कर्मी ने हौले से कहा, “बीमारी ठीक हो जाती है, लेकिन परिवार का डर और समाज की धारणा नहीं बदलती। कई बार घर वाले सोचते हैं कि फिर से समस्या न खड़ी हो जाए।”

पुनर्वास की कोशिशें, लेकिन रास्ता लंबा

निरीक्षण के बाद डालसा की टीम ने सभी 47 मरीजों की विस्तृत सूची ली है। डालसा सचिव राकेश रौशन ने बताया कि काउंसलिंग के जरिए परिवारों से संपर्क करने की योजना है। कोशिश होगी कि जो पूरी तरह स्वस्थ हैं, उन्हें समाज की मुख्यधारा में वापस लाया जाए। जरूरत पड़ी तो पुनर्वास की वैकल्पिक व्यवस्था भी की जाएगी। पर कागजों से आगे की लड़ाई भावनाओं की है। किसी को घर लौटने के लिए सिर्फ मेडिकल क्लियरेंस नहीं, भरोसा और अपनापन भी चाहिए।

वार्ड की खिड़की से दिखती दुनिया

शाम ढलने लगती है तो वार्ड की खिड़कियों से बाहर की दुनिया दिखती है। सड़क पर भागती गाड़ियां, घर लौटते लोग, बच्चों की आवाजें। भीतर बैठे कुछ चेहरे उन आवाजों को चुपचाप सुनते हैं। इनमें से कई अब स्वस्थ हैं। लेकिन उनके लिए घर का मतलब सिर्फ एक पता नहीं, एक एहसास है, जो कहीं छूट गया।

इसे भी पढ़ें : एक विक्षिप्त की खामोश पीड़ा और डालसा की इंसानियत… जानें 

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