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Ramgarh (Dharmendra Pradhan) : रामगढ़ के गोला प्रखंड के बरियातू गांव के उस छोटे से पक्के मकान के आंगन में आज पैर रखने की जगह नहीं थी, लेकिन चारों तरफ एक भारी, पथरीला सन्नाटा पसरा था। वही आंगन, जहां कुछ रोज पहले तक कानून की मोटी-मोटी किताबें हाथ में लिए एक लड़की अपने सपनों की उड़ान भर रही थी। आज उसी आंगन की ठंडी जमीन पर झारखंड हाईकोर्ट की अधिवक्ता अनुष्का चक्रवर्ती का निर्जीव शरीर सफेद कफन में लिपटा पड़ा था। जिस मां ने अपनी हर खुशी गिरवी रखकर बेटी को पढ़ाया-लिखाया, वह बेसुध होकर बार-बार अपनी बेटी का चेहरा छूने की कोशिश कर रही थी। पिता की आंखें पथरा चुकी थीं, जैसे वे अब तक यकीन ही न कर पा रहे हों कि जिस लाडली को उन्होंने डोली में बिठाकर नई दुनिया बसाने भेजा था, वह यूं अर्थी पर लौट आएगी।
खिलखिलाते चेहरे के पीछे का दर्द कोई भांप न सका
दुर्गा पूजा की दशमी का वह दृश्य आज भी गांव की महिलाओं की आंखों में तैर रहा है। मां दुर्गा के पंडाल में लाल पाड़ वाली साड़ी पहने अनुष्का सिंदूर खेला में शामिल हुई थीं। चेहरे पर वही जानी-पहचानी मुस्कान थी, आंखों में भविष्य की उम्मीदें थीं और सहेलियों के साथ ठहाके गूंज रहे थे। किसे पता था कि उस खिलखिलाहट के पीछे घुटन का कोई ऐसा अंधियारा पनप रहा था, जो चंद घंटों बाद उसकी सांसों को ही निगल जाएगा। जब हजारीबाग से खबर आई कि अनुष्का का शव फांसी के फंदे पर झूलता मिला है, तो बरियातू गांव का कलेजा फट पड़ा। अदालत में दूसरों के हक की वकालत करने वाली बेटी अपनी जिंदगी की पैरवी में इतनी बेबस कैसे हो गई, यह सवाल हर उस आंख में तैर रहा है जो उसके अंतिम दर्शन को पहुंची थी।
बंद कमरे का सन्नाटा और फरार ससुराल वालों के अनसुलझे सवाल
बेटी की मौत की खबर मिलते ही जब मायके वाले हजारीबाग पहुंचे, तो ससुराल के दरवाजे पर सन्नाटा पसरा था और घर के सारे लोग गायब थे। परिजनों के मुताबिक, यह कोई सामान्य आत्महत्या नहीं बल्कि दहेज की कभी न बुझने वाली हवस की भेंट चढ़ी एक सुनियोजित हत्या है। मां-बाप का रो-रोकर यही कहना है कि शादी के बाद से ही उनकी बेटी को लगातार ताने और मानसिक यातनाएं दी जा रही थीं। घटना के तुरंत बाद ससुराल वालों का घर छोड़कर भाग जाना इस शक को और ज्यादा गहरा कर देता है। जिस घर को संवारने के लिए एक पढ़ी-लिखी लड़की ने अपने कदम रखे, उसी घर की चारदीवारी उसके लिए काल बन जाएगी, इसका अंदाजा मायके वालों को कभी नहीं था।
मोमबत्तियों की लौ में जलता इंसाफ का सवाल

इस गमगीन माहौल के बीच जब अनुष्का की अंतिम विदाई हुई, तो मातम के साथ-साथ इलाके के लोगों में गुस्से का लावा भी फूट पड़ा। रामगढ़ के डीवीसी चौक पर सैकड़ों हाथों में जलती मोमबत्तियां सिर्फ शोक का प्रतीक नहीं थीं, बल्कि वे सिस्टम से जवाब मांग रही थीं। स्थानीय विधायक ममता देवी के नेतृत्व में निकाले गए कैंडल मार्च में हर वर्ग के लोग शामिल हुए। किसी की जुबान पर आंसू थे तो किसी की आंखों में आक्रोश। हर कोई एक ही सवाल पूछ रहा था कि आखिर कब तक बेटियां लालच और प्रताड़ना की सूली पर चढ़ती रहेंगी। अब परिजनों को केवल हमदर्दी के दो बोल नहीं चाहिए, उन्हें अपनी होनहार बेटी की मौत के जिम्मेदारों के लिए कानून का सबसे कड़ा इंसाफ चाहिए ताकि उस बूढ़े बाप की पथराई आंखों को कुछ तो चैन मिल सके।
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