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Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि लंबे समय तक दो बालिगों के बीच सहमति से बने रिश्ते को केवल शादी न होने की वजह से दुष्कर्म नहीं ठहराया जा सकता। जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की अदालत ने गिरिडीह निवासी युवक के खिलाफ दर्ज एफआईआर, निचली अदालत के संज्ञान आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह रद्द कर दिया है। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि शिकायत के सभी आरोपों को सच मान भी लिया जाए, तो भी यह मामला दो वयस्कों के बीच आपसी रजामंदी से बने रिश्ते का दिखता है। उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आईपीसी की धारा 376(2)(n) के तहत अपराध साबित नहीं होता।
शादी समारोह में मुलाकात से लेकर रांची के होटल तक की कहानी
पूरे मामले की शुरुआत साल 2016 में हुई थी, जब एक दोस्त की शादी में महिला और युवक की पहली मुलाकात हुई। दोनों के बीच बातचीत बढ़ी, फोन नंबर बदले गए और धीरे-धीरे यह जान-पहचान प्यार में बदल गई। महिला का आरोप था कि युवक अक्सर उससे गिरिडीह रेलवे स्टेशन के आसपास मिलता था और शादी का भरोसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। यह रिश्ता करीब सात साल तक लगातार चलता रहा। दिसंबर 2022 में युवक महिला को लेकर रांची आया, जहां दोनों एक होटल में ठहरे और वहां भी शारीरिक संबंध बने। महिला का कहना था कि वह बार-बार शादी का दबाव बनाती रही, लेकिन युवक हर बार बात टाल देता था। अप्रैल 2023 में जब युवक ने अचानक अपना फोन बंद कर लिया, तो महिला ने उसके परिजनों से संपर्क किया। महिला के अनुसार, युवक के परिवार ने शादी से साफ मना करते हुए उसके साथ दुर्व्यवहार किया। इसके बाद महिला ने गिरिडीह महिला थाने में दुष्कर्म का केस दर्ज करा दिया, जिस पर पुलिस ने जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल की और सीजेएम कोर्ट ने संज्ञान ले लिया।
सुप्रीम कोर्ट की नजीर: हर टूटा वादा धोखे की श्रेणी में नहीं आता
निचली अदालत के फैसले के खिलाफ युवक ने हाईकोर्ट की शरण ली। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों की नजीर पेश की गई। अदालत ने ‘प्रमोद सूर्यभान पवार’ और वर्ष 2024 के ‘महेश दामू खरे’ मामले के फैसलों का हवाला देते हुए कानून की स्थिति साफ की। कोर्ट ने रेखांकित किया कि शादी का वादा तभी झूठा या छलावा माना जा सकता है, जब संबंध की शुरुआत में ही युवक की शादी करने की नीयत बिल्कुल न रही हो और उसी झूठ के दम पर महिला की सहमति ली गई हो। अगर शुरुआत में इरादा शादी का था, लेकिन बाद में बिगड़े हालातों या किसी विवाद के कारण शादी नहीं हो पाई, तो इसे कानूनी रूप से धोखे का वादा नहीं कहा जा सकता। अदालत ने पाया कि इस मामले में ऐसा कोई पुख्ता आधार रिकॉर्ड पर नहीं है जिससे साबित हो कि युवक की मंशा शुरू से ही शादी न करने की थी।
सात साल का लंबा रिश्ता और कानून के दुरुपयोग पर रोक
जस्टिस अनिल कुमार चौधरी ने कहा कि दोनों के बीच सात साल से भी ज्यादा समय तक संबंध बने रहे, जो यह दिखाता है कि यह दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से चला आ रहा रिश्ता था। दोनों के बीच केस दर्ज कराने की असली वजह बाद में शादी को लेकर उपजा विवाद था। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे हालात में युवक के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाना कानून की प्रक्रिया का सरासर दुरुपयोग होगा। हाईकोर्ट ने अपने अंतर्निहित अधिकारों का प्रयोग करते हुए गिरिडीह सीजेएम अदालत द्वारा 16 अगस्त 2024 को लिए गए संज्ञान आदेश और केस की पूरी कानूनी कार्रवाई को खारिज कर दिया।
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