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Ranchi/West Bengal : लाल गलियारे में आतंक का दूसरा नाम बन चुका प्रतिबंधित भाकपा माओवादी का सेंट्रल कमेटी मेंबर असीम मंडल उर्फ आकाश आखिरकार पुलिस के सामने नतमस्तक हो गया। उसने पश्चिम बंगाल में सुरक्षा बलों के समक्ष सरेंडर कर दिया है। असीम मंडल पर झारखंड और ओडिशा पुलिस की ओर से कुल मिलाकर 2 करोड़ 20 लाख रुपये का भारी-भरकम इनाम घोषित था। इसमें अकेले झारखंड सरकार ने उस पर एक करोड़ रुपये और ओडिशा सरकार ने एक करोड़ बीस लाख रुपये का इनाम रखा था। झारखंड पुलिस मुख्यालय ने असीम मंडल के बंगाल में हथियार डालने की आधिकारिक पुष्टि कर दी है। इसके साथ ही सारंडा, कोल्हान और बंगाल-ओडिशा सीमा पर तीन दशक से जारी उसके खौफ का अंत हो गया है।
गांव के सीधे लड़के से सेंट्रल कमेटी तक का सफर
असीम मंडल मूल रूप से पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले का रहने वाला था। अस्सी के दशक के अंत में वह छात्र राजनीति और स्थानीय आंदोलनों से जुड़ा, लेकिन जल्द ही नक्सली विचारधारा के प्रभाव में आ गया। जंगलमहल के बीहड़ों में माओवादी दस्ते में शामिल होने के बाद उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। संगठन के भीतर उसकी रणनीति बनाने की महारत और आक्रामक शैली को देखते हुए उसे तेजी से पदोन्नति मिली। उसने बंगाल के जंगलमहल से लेकर झारखंड के पूर्वी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां और चाईबासा के सारंडा जंगलों तक अपना नेटवर्क फैलाया। किसान-मजदूर राजनीति के नाम पर उसने संगठन में दर्जनों युवाओं की भर्ती की। किशनजी की मौत के बाद बंगाल-झारखंड-ओडिशा सीमांत क्षेत्र की पूरी कमान उसी के हाथों में थी, जिसके चलते उसे माओवादियों की शीर्ष नीति निर्माता संस्था सेंट्रल कमेटी में जगह दी गई थी।

बड़ी वारदातों और एंबुश का मास्टरमाइंड
असीम मंडल पर सुरक्षा बलों पर जानलेवा हमले, बारूदी सुरंग विस्फोट, नेताओं की हत्या और रंगदारी वसूली के कई दर्जन गंभीर मामले दर्ज हैं। साल 2007 में झारखंड के जमशेदपुर से झामुमो सांसद सुनील महतो की हत्या की साजिश में असीम मंडल का नाम प्रमुखता से सामने आया था, जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। इसके बाद उसने 2008 में पूर्वी सिंहभूम और बंगाल सीमा पर सीआरपीएफ और पुलिस की संयुक्त टुकड़ी पर बड़ा एंबुश लगाया, जिसमें कई जवान शहीद हुए थे। 2010 के दशक में उसने सारंडा और कोल्हान के जंगलों को अपना अभेद्य किला बना लिया था। साल 2014 और 2019 के चुनावों के दौरान सुरक्षा बलों की गाड़ियों को आईईडी ब्लास्ट से उड़ाने और ओडिशा के मयूरभंज इलाके में पुलिस कैंपों पर हमले की कई वारदातों को उसी के निर्देश पर अंजाम दिया गया था।
हाल के दिनों में सुरक्षा बलों के लगातार बढ़ते दबाव, घटते जनाधार और अपनी खराब सेहत के चलते वह अलग-थलग पड़ गया था। आखिरकार उसने छिपने के बजाय बंगाल में पुलिस के सामने घुटने टेकना ही बेहतर समझा।
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