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Home » न डिग्री, न कोई गॉडफादर… सिर्फ जिद और जिगर के दम पर खड़ा किया ‘अदाणी साम्राज्य’
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न डिग्री, न कोई गॉडफादर… सिर्फ जिद और जिगर के दम पर खड़ा किया ‘अदाणी साम्राज्य’

June 24, 2026No Comments8 Mins Read
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अदाणी
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Ranchi : आज सुबह जब सूरज की पहली किरण देश के सबसे बड़े कमर्शियल पोर्ट ‘मुंद्रा’ के पानी पर पड़ी होगी, तो वहां खड़े विशालकाय जहाजों के हॉर्न ने जैसे किसी आम सुबह की शुरुआत नहीं की होगी। उन्होंने मानो अपने उस मुखिया को जन्मदिन की बधाई दी होगी, जिसने तीन दशक पहले इस बंजर और दलदली जमीन पर खड़े होकर एक ऐसा सपना देखा था जिसे तब लोगों ने ‘पागलपन’ कहा था। आज देश के दिग्गज बिजनेसमैन गौतम अदाणी का जन्मदिन है। यह दिन सिर्फ एक कैलेंडर की तारीख नहीं है, बल्कि यह जश्न है उस जिद का, जिसने एक आम भारतीय मध्यमवर्गीय लड़के को दुनिया के सबसे अमीर इंसानों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया। आइए, फाइलों और आंकड़ों के चश्मे को उतारकर, आज इस इंसान के सफर को एक फीचर कहानी की तरह जीते हैं… एक ऐसी कहानी जिसमें रिस्क है, रोमांस है, बड़े-बड़े झटके हैं और उन झटकों से उबरकर खड़े होने का गजब का जज्बा है।

जब जेब में चंद नोट थे और आंखों में समंदर

कहानी की शुरुआत होती है सत्तर के दशक के आखिरी सालों से। अहमदाबाद का पोल इलाका, जहां की तंग गलियों में साइकिलों की घंटियां और आम गुजराती परिवारों की बातें गूंजती थीं। इसी माहौल में सात भाई-बहनों के बड़े परिवार के बीच गौतम बड़े हो रहे थे। पिता शांतिलाल जी कपड़ों का छोटा-मोटा व्यापार करते थे, जिससे घर का खर्च जैसे-तैसे चल जाता था। गौतम का मन पढ़ाई से ज्यादा इस बात में रमता था कि दुनिया में व्यापार कैसे होता है। गुजरात यूनिवर्सिटी में कॉमर्स की पढ़ाई शुरू तो की, लेकिन दूसरे ही साल उन्होंने कॉलेज की किताबों को हमेशा के लिए बंद कर दिया। यह एक ऐसा फैसला था जिसे सुनकर किसी भी आम भारतीय माता-पिता के पैरों तले जमीन खिसक जाए। लेकिन 18 साल के इस लड़के की आंखों में कुछ और ही चल रहा था। वह केवल डिग्रियों के सहारे एक सुरक्षित नौकरी नहीं चाहते थे, उन्हें तो पूरा समंदर नापना था।

मुंबई लोकल की भीड़ और हीरों की चमक

कॉलेज छोड़ते ही गौतम ने अपनी जेब में कुछ सौ रुपये डाले और मुंबई की लोकल ट्रेन पकड़ ली। मुंबई… सपनों का शहर, जो नए लोगों को आसानी से जगह नहीं देता। वहां उन्होंने महेंद्र ब्रदर्स कंपनी में डायमंड सॉर्टर यानी हीरा छांटने का काम शुरू किया। दिन भर हीरों की चमक को बारीक नजर से देखना और बाजार के उतार-चढ़ाव को समझना उनका रोज का काम था। लेकिन वो सिर्फ नौकरी करने नहीं आए थे। महज दो साल के भीतर, यानी सिर्फ 20 साल की उम्र में उन्होंने मुंबई के जावेरी बाजार में खुद का हीरा ब्रोकरेज का काम शुरू कर दिया। पुराने लोग के अनुसार उस युवा लड़के में ग्राहकों को परखने और सौदा तय करने की गजब की कला थी। उस छोटे से काम से उन्होंने उस दौर में लाखों रुपये कमाए। यह उनकी पहली कारोबारी जीत थी, जिसने उन्हें सिखाया कि बिजनेस सिर्फ पैसों से नहीं, सही समय पर सही फैसले लेने से चलता है।

भाई की एक आवाज और ‘अदाणी साम्राज्य’ की पहली ईंट

तभी साल 1981 में उनके बड़े भाई मनसुखभाई अदाणी ने अहमदाबाद में प्लास्टिक की एक छोटी सी यूनिट खरीदी। भाई ने छोटे भाई की व्यापारिक समझ को पहचान लिया था, इसलिए उन्होंने गौतम को वापस गुजरात बुला लिया। यहीं से असली खेल शुरू हुआ। प्लास्टिक बनाने के लिए पीवीसी यानी पॉलीविनाइल क्लोराइड की जरूरत होती थी, जिसे विदेश से मंगाना पड़ता था। गौतम अदाणी ने कमोडिटी ट्रेडिंग यानी कच्चे माल के आयात-निर्यात में हाथ आजमाया। साल 1988 आया, और उन्होंने ‘अदाणी एक्सपोर्ट्स लिमिटेड’ की नींव रखी। शुरुआत में यह कंपनी सिर्फ कृषि उत्पाद और बिजली के सामानों का छोटा-मोटा व्यापार करती थी। फिर आया साल 1991, जिसने भारत की किस्मत के साथ-साथ गौतम अदाणी की तकदीर भी बदल दी। देश में आर्थिक उदारीकरण की बयार चली। सरकार ने व्यापार के कड़े नियम ढीले किए। अदाणी ने भांप लिया कि अब देश को सिर्फ सुई-धागे या कपड़ों की जरूरत नहीं है, अब देश को आगे बढ़ने के लिए बड़े-बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है।

बंजर जमीन पर लिखा कामयाबी का महाकाव्य… मुंद्रा पोर्ट

साल 1993 में गुजरात सरकार ने मुंद्रा में एक पोर्ट बनाने के लिए निजी कंपनियों को न्योता दिया। 1995 में यह काम अदाणी ग्रुप को मिला। तब मुंद्रा एक सुनसान, दलदली और बंजर इलाका था, जहां दूर-दूर तक सिर्फ खारा पानी और सन्नाटा था। लोग हंसते थे कि यहां कौन सा जहाज आएगा? लेकिन गौतम अदाणी के पास वो नजर थी जो धूल में भी हीरा देख लेती है। उन्होंने दिन-रात एक करके उस बंजर जमीन को देश के सबसे बड़े और आधुनिक प्राइवेट पोर्ट में बदल दिया। उन्होंने वहां सिर्फ एक बंदरगाह नहीं बनाया, बल्कि उसे देश के कोने-कोने से जोड़ने के लिए खुद की रेलवे लाइन तक बिछा दी। आज मुंद्रा पोर्ट भारत की आर्थिक रीढ़ की तरह काम करता है, जहां हर दिन दुनिया के सबसे बड़े जहाज आकर रुकते हैं।

मौत को छूकर गुजरना : जब किस्मत ने कहा ‘अभी तुम्हारा वक्त बाकी है’

गौतम अदाणी का जीवन किसी थ्रिलर फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा भी रहा है। उनकी जिंदगी में दो ऐसे वाकये हुए जब मौत उनके बिल्कुल करीब खड़ी थी। साल 1998 में कुछ बदमाशों ने फिरौती के लिए उनका किडनैप कर लिया था। वह एक बेहद खौफनाक दौर था, लेकिन वह वहां से सुरक्षित बच निकले। इसके ठीक दस साल बाद, 26 नवंबर 2008 को जब मुंबई के ताजमहल होटल पर आतंकियों ने हमला किया, तब गौतम अदाणी उसी होटल के रेस्टोरेंट में अपने दोस्तों के साथ डिनर कर रहे थे। उन्होंने अपनी आंखों के सामने गोलियां चलते और तबाही मचते देखी। वह पूरी रात होटल के एक बेसमेंट में अन्य मेहमानों के साथ बंद रहे। सुबह जब कमांडोज ने उन्हें बाहर निकाला, तो उन्होंने राहत की सांस ली। इन घटनाओं ने उन्हें जिंदगी को और करीब से देखना सिखाया। वह अक्सर कहते हैं कि जब किस्मत आपको ऐसे मौकों से बचाती है, तो इसका मतलब है कि आपको देश के लिए कुछ और बड़ा करना है।

कोयले से लेकर सूरज की रोशनी तक का सफर

बिजनेस की दुनिया में कहा जाता है कि कभी भी अपने सारे अंडे एक ही टोकरी में नहीं रखने चाहिए। गौतम अदाणी ने इस नियम को गांठ बांध लिया। पोर्ट्स के बाद उन्होंने बिजली बनाने के क्षेत्र में कदम रखा। ‘अदाणी पावर’ देश की बड़ी प्राइवेट बिजली कंपनियों में शामिल हो गई। इसके बाद हमारे घरों में इस्तेमाल होने वाला ‘फॉर्च्यून’ तेल (अदाणी विल्मार) आया। फिर गैस पाइपलाइन, सड़कें और देश के बड़े-बड़े हवाई अड्डे (जैसे मुंबई और अहमदाबाद एयरपोर्ट) भी इस काफिले में शामिल होते गए। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब उन्होंने कोयले और पारंपरिक ईंधन के साथ-साथ ‘ग्रीन एनर्जी’ यानी सौर और पवन ऊर्जा में भारी निवेश करना शुरू किया। आज ‘अदाणी ग्रीन एनर्जी’ दुनिया की सबसे बड़ी सोलर कंपनियों में से एक है। वह अक्सर कहते हैं कि आने वाला कल साफ-सुथरी ऊर्जा का है, और भारत को इसमें आत्मनिर्भर होना ही पड़ेगा।

वो तूफान जिसने हिला दिया, पर झुका नहीं पाया

बीते कुछ साल अदाणी ग्रुप के लिए किसी कड़े इम्तिहान से कम नहीं रहे। एक विदेशी रिसर्च फर्म की रिपोर्ट आई, चारों तरफ हंगामा मच गया, शेयर बाजार में उनकी कंपनियों के दाम ताश के पत्तों की तरह गिरने लगे। आलोचकों ने मान लिया कि अब अदाणी साम्राज्य का अंत करीब है। दुनिया भर की मीडिया में सुर्खियां बनने लगीं। लेकिन यहीं पर एक मंझे हुए खिलाड़ी की असली पहचान होती है। गौतम अदाणी ने पैनिक करने के बजाय चुप्पी साधी और काम पर ध्यान दिया। उन्होंने अपनी रणनीति बदली, समय से पहले बैंकों के कर्ज चुकाए, विदेशी निवेशकों से सीधी बात की और उनका भरोसा दोबारा जीता। नतीजा यह हुआ कि कुछ ही महीनों में उनकी कंपनियां फिर से ट्रैक पर लौट आईं। यह घटना उनके जीवन का सबसे बड़ा सबक है कि जब आपके इरादे पक्के हों, तो कोई भी तूफान आपको हमेशा के लिए नहीं गिरा सकता।

सादगी, परिवार और समाज को वापस लौटाने का जज्बा

इतनी शोहरत और दौलत के बावजूद गौतम अदाणी को जानने वाले बताते हैं कि वह बेहद सरल स्वभाव के हैं। उन्हें तामझाम से ज्यादा अपने परिवार के साथ वक्त बिताना पसंद है। उनकी पत्नी प्रीति अदाणी, जो एक डॉक्टर हैं, ‘अदाणी फाउंडेशन’ के जरिए देश के ग्रामीण इलाकों में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ा काम कर रही हैं। अपने 60वें जन्मदिन पर गौतम अदाणी ने एक मिसाल पेश की थी। उन्होंने अपने परिवार की तरफ से सामाजिक कार्यों के लिए 60,000 करोड़ रुपये दान करने का फैसला किया। यह पैसा आज देश के उन बच्चों की पढ़ाई और गरीबों के इलाज पर खर्च हो रहा है, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। मिट्टी से उठकर आसमान की ऊंचाइयों को छूने वाले इस जमीनी जादूगर को जन्मदिन पर सलाम।

इसे भी पढ़ें : आंखों की टिमटिमाती लौ को फिर से रोशन करेंगे गौतम अदाणी, बिहार में रखी नींव

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