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Pakur (Jaydev Kumar) : आज 17 अक्टूबर 2025 का दिन पाकुड़ के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया। राजधानी दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों से ‘आदिकर्मयोगी अभियान’ नेशनल कॉन्क्लेव में “Outstanding Performance & Innovative Initiatives in Advancing Inclusive Tribal Development” का राष्ट्रीय सम्मान पाकुड़ के डीसी मनीष कुमार को मिला, तो पूरा झारखंड गौरवान्वित हो उठा। यह केवल एक पुरस्कार नहीं, बल्कि उन सैकड़ों पहाड़ी, वनवासी और जनजातीय परिवारों की मेहनत, उम्मीदों और विश्वास का सम्मान है, जिन्होंने “विकास” शब्द को पहली बार अपने जीवन में साकार रूप में महसूस किया।
जनजातीय विकास में नया पैमाना
पाकुड़, जो कभी सीमित संसाधनों और भौगोलिक चुनौतियों के लिए जाना जाता था, आज समावेशी जनजातीय विकास का प्रतीक बन चुका है। यहां प्रशासन ने न केवल योजनाओं को धरातल पर उतारा, बल्कि स्थानीय परंपराओं, भाषा और संस्कृति के साथ तालमेल बिठाकर एक नया मॉडल तैयार किया।
- शिक्षा के क्षेत्र में “आदिवासी डिजिटल एजुकेशन हब” जैसी पहलें
- स्वास्थ्य सेवाओं में “मोबाइल मेडिकल यूनिट” की सफल कार्यान्वयन
- स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए “जनजातीय उत्पाद ब्रांडिंग एवं मार्केट लिंकिंग”
- और ग्राम पंचायत स्तर पर “महिला समूह आधारित पोषण अभियान”
इन सभी नवाचारों ने न केवल केंद्र सरकार का ध्यान खींचा, बल्कि नीति आयोग तक ने पाकुड़ के मॉडल को “रेप्लिकेबल बेस्ट प्रैक्टिस” बताया।
लोगों के बीच से उठी प्रेरणा
पाकुड़ की सफलता का सबसे बड़ा आधार रहा… लोगों का जुड़ाव। हर योजना में जनता को “लाभार्थी” नहीं, बल्कि “भागीदार” बनाया गया। जिला प्रशासन की इस सोच ने सरकारी तंत्र और ग्रामीण समाज के बीच भरोसे की खाई को पाट दिया। सिदो-कान्हू की धरती पर प्रशासन और समाज का यह सहयोग आज नई आज़ादी की नई कहानी लिख रहा है।
डीसी मनीष कुमार की नेतृत्व शैली बनी मिसाल
पाकुड़ के डीसी मनीष कुमार की कार्यशैली हमेशा टीम भावना और नवाचार पर आधारित रही है। वे अक्सर कहते हैं… “विकास का असली अर्थ है, जब समाज खुद आगे बढ़ना चाहे और प्रशासन उसके साथ चले।” उनके इस दृष्टिकोण ने प्रशासन को आदेश देने वाली संस्था नहीं, बल्कि साथ चलने वाला साथी बना दिया।
सम्मान सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, एक सोच का है… यह पुरस्कार पाकुड़ की उस सोच का परिणाम है, जिसने “सीमाओं” को बहाने की बजाय, उन्हें “संभावनाओं” में बदला। यह सम्मान उस टीम का है, जो गांव-गांव तक उम्मीद की रौशनी लेकर पहुंची। यह सम्मान उस जनजातीय समाज का है, जिसने बदलाव को अपनाया और अपनी परंपराओं के साथ आगे बढ़ने की मिसाल पेश की।
इतिहास पर इतिहास रचता पाकुड़…
पहले “फर्जी आधार जांच” जैसी सख्त प्रशासनिक कार्रवाई, फिर शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण के क्षेत्र में नवाचार और अब यह राष्ट्रीय सम्मान। पाकुड़ सचमुच इतिहास पर इतिहास लिख रहा है।
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