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Palamu : आसमान से बरसता ठंडा पानी, चारों तरफ पसरा घना अंधेरा और धान के कीचड़ भरे खेत के बीच से आती एक मासूम की धीमी सिसकी। दुनिया में आए उसे अभी तीन घंटे भी पूरे नहीं हुए थे। जिस नन्हीं जान को मां के सीने की गर्माहट और ममता का आंचल मिलना चाहिए था, वह खुले आसमान के नीचे बिना कपड़ों के गीली मेढ़ पर पड़ी ठंड से कांप रही थी। पास ही सिंदूर, टिकली और अगरबत्ती जैसी पूजा सामग्री रखी थी। झारखंड के पलामू स्थित छतरपुर के मनहूं गांव में शुक्रवार की रात जो कुछ हुआ, उसने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया। देवी मंदिर के पास उस मासूम को जिस बेरहमी से बलि चढ़ाने या मरने के लिए छोड़ दिया गया था, उसे देखकर पत्थर दिल इंसान की भी रूह कांप जाए। लेकिन कहते हैं न कि जिसकी रक्षा कुदरत करती है, उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता।
अंधेरे में चमकती टॉर्च की रोशनी और दरिंदगी का पर्दाफाश
रात के करीब नौ बज रहे थे और रुक-रुक कर बारिश हो रही थी। मनहूं गांव से दूर खेतों के बीच बने देवी मंदिर के आसपास पानी भरा हुआ था, जहां गांव के कुछ नौजवान मछलियां पकड़ने निकले थे। तभी टॉर्च की रोशनी में उन्होंने देखा कि तीन औरतें चुपचाप एक झोले के साथ मंदिर के पिछले हिस्से की तरफ बढ़ रही हैं। इतनी रात में, सुनसान जगह पर महिलाओं की मौजूदगी ने युवकों को चौंका दिया। जब वे दबे पांव करीब पहुंचे, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उन औरतों ने झोले से एक नवजात बच्ची को निकाला और बिना किसी कपड़े के खेत की गीली मेढ़ पर रख दिया। इसके बाद वे थैले से सिंदूर, टिकली और कंघी जैसी सामग्री निकालकर कोई गुप्त अनुष्ठान करने की तैयारी करने लगीं। युवकों को समझते देर नहीं लगी कि यह मामला किसी अंधविश्वास या बलि से जुड़ा है। उन्होंने बिना वक्त गंवाए जोर-जोर से शोर मचाना शुरू कर दिया। शोर सुनते ही दो महिलाएं अंधेरे और खेतों की आड़ लेकर भाग निकलीं, लेकिन बच्ची को जन्म देने वाली मां वहीं पकड़ी गई।
नफरत पर भारी पड़ी इंसानियत, मसीहा बनकर पहुंचे जहीर
युवकों का शोर सुनकर आसपास के ग्रामीण भी मौके पर जुट गए। पकड़ी गई महिला की पहचान पास के गांव की मंजू देवी के रूप में हुई। लोग गुस्से में थे और महिला से जवाब मांग रहे थे, लेकिन उस अफरा-तफरी के बीच किसी का ध्यान उस फूल सी बच्ची पर नहीं जा रहा था, जो ठंड और ओस के कारण नीली पड़ चुकी थी। इसी बीच खबर पाकर मुनकेरी गांव के समाजसेवी जहीर अंसारी वहां पहुंचे। उन्होंने देखा कि बच्ची की सांसें उखड़ रही हैं और वह जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है। जहीर ने लोगों से कहा कि सवाल-जवाब बाद में होंगे, पहले इस मासूम की जान बचानी होगी। उन्होंने फौरन बच्ची को एक गर्म कपड़े में लपेटा, अपने सीने से लगाया और अपनी गाड़ी में मां और नवजात को बैठाकर सीधे अस्पताल की ओर दौड़ पड़े। डॉक्टरों ने बच्ची की हालत बेहद नाजुक देखकर उसे तुरंत आईसीयू में भर्ती किया, जहां वार्मर के जरिए उसके ठंडे पड़ चुके जिस्म में दोबारा जिंदगी की गर्माहट लौटाई गई।
पांचवीं औलाद का दर्द या अंधविश्वास का खूनी खेल
अस्पताल के बेड पर लेटी मां मंजू देवी अब पुलिस के सवालों के घेरे में है, लेकिन यह सवाल पूरे समाज के मुंह पर तमाचा मार रहा है कि आखिर एक मां इतनी निष्ठुर कैसे हो सकती है। मंजू के पति रविंद्र उरांव दिहाड़ी मजदूरी करते हैं और उनके पहले से दो बेटे और दो बेटियां हैं। यह बच्ची उनकी पांचवीं संतान थी। क्या गरीबी और लाचारी की वजह से इस बच्ची को मौत के मुंह में धकेला गया, या फिर किसी तांत्रिक के बहकावे में आकर अपनी ही कोख से जन्मी बच्ची की बलि चढ़ाने की खौफनाक साजिश रची जा रही थी? महिला अपने घर से करीब आठ किलोमीटर दूर उस सुनसान मंदिर तक नवजात को लेकर कैसे और क्यों पहुंची, यह पहेली अब भी अनसुलझी है। पुलिस फरार दोनों महिलाओं की तलाश कर रही है, ताकि इस पूरे राज से पर्दा उठ सके। फिलहाल आईसीयू के शीशे के पीछे वह नन्हीं परी जिंदगी की जंग लड़ रही है, बेखबर इस बात से कि जिस दुनिया में उसने अभी आंखें खोली हैं, वहां अपनों ने ही उसे मौत के हवाले कर दिया था और गैरों ने मसीहा बनकर उसकी सांसें बचा लीं।
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