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Ranchi : दिवाली की आहट हो और दिल कुछ नया, कुछ अपना तलाशने लगे, तो जेसोवा दिवाली मेला सीधे दिल को छू जाता है। शुक्रवार को मेले का दूसरा दिन था और राजधानी रांची की दोपहर ढलते ही मेला परिसर में मानो पूरा शहर सिमट आया। सुबह जब मेले के कपाट खुले थे, तो हवा में हल्की ठंडक और त्योहार की हल्की सुगबुगाहट थी, लेकिन घड़ी की सुइयां जैसे-जैसे आगे बढ़ीं, लोगों के कदमों की आहट एक बड़े उत्सव में बदल गई। रंग-बिरंगी रोशनियों से नहाए स्टॉल्स, बच्चों की खिलखिलाहट, पारंपरिक खान-पान की सोंधी खुशबू और खरीदारी की गहमागहमी ने यह साबित कर दिया कि यह सिर्फ बाजार नहीं, खुशियों का साझा ठिकाना है।
सजावट के सामान से लेकर पारंपरिक परिधानों तक की धूम
मेले के गलियारों से गुजरते हुए त्योहार की असली रौनक नजर आ रही थी। कहीं मिट्टी के दीयों और हस्तनिर्मित झूमरों से घर को सजाने की होड़ थी, तो कहीं पारंपरिक हैंडलूम और नए ट्रेंडी कपड़ों के स्टॉल्स पर महिलाओं की लंबी कतारें लगी थीं। हर कोई अपने आशियाने को दिवाली पर सबसे खूबसूरत रूप देने के लिए सामान चुनता नजर आया। सिर्फ खरीदारी ही नहीं, खान-पान के कोनों पर भी कम भीड़ नहीं थी। चाट, पकौड़े और पारंपरिक मिठाइयों के स्वाद ने मेले के माहौल को और भी खुशनुमा बना दिया। युवा दोस्तों की टोलियां सेल्फी लेने में मग्न थीं, तो परिवार के बुजुर्ग इत्मीनान से मेले के जीवंत रंगों को अपनी आंखों में समेट रहे थे।
जब छऊ नृत्य की थाप पर ठिठक गए शहरवासियों के कदम
जैसे ही शाम घिरी, मेले के सांस्कृतिक मंच से उठी सुरों की तान ने पूरी भीड़ का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। मंच पर सबसे पहले गूंजा महात्मा गांधी का सबसे प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’। माधवी की सधी और भावपूर्ण आवाज ने भीड़ की सारी हलचल को एक पल में शांत कर पूरे माहौल को भक्ति रस से भर दिया। लोग जहां खड़े थे, वहीं ठहरकर इन सुरों में डूब गए।
इसके बाद मंच पर उतरी झारखंड की लोककला की असली शान, सरायकेला छऊ नृत्य। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित गुरु श्री तपन कुमार पटनायक के कुशल निर्देशन में जब कलाकारों ने पारंपरिक मुखौटे और सधे हुए कदमों के साथ मंच संभाला, तो पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। कलाकारों ने मंगलाचरण और आरती से शुरुआत कर हर-पार्वती, धीर और राधा-कृष्ण के प्रसंगों को इतनी खूबसूरती से मंच पर जिया कि दर्शकों की नजरें मंच से हटने का नाम नहीं ले रही थीं। यह प्रस्तुति आधुनिकता के बीच अपनी जड़ों और समृद्ध लोक परंपरा से जुड़ने का एक बेहद खूबसूरत अहसास थी।
कोरे कागजों पर उतरी मासूम सोच
सांस्कृतिक शाम के समानांतर मेले का एक और कोना दिनभर बाल प्रतिभा और रंगों के जादू से जगमगाता रहा। यहां कक्षा दो से बारहवीं तक के स्कूली बच्चों के लिए चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन हुआ था। छोटे बच्चों यानी कक्षा दो से पांचवीं तक के नन्हे कलाकारों को किसी विषय की बंदिश में नहीं बांधा गया। उन्होंने अपनी कल्पना की खुली उड़ान भरी और कागजों पर तितलियां, पहाड़, सूरज और दीयों के मासूम रंग बिखेरे।
वहीं, कक्षा छह से नौवीं के विद्यार्थियों ने सामाजिक सरोकारों पर ब्रश चलाया, जबकि दसवीं से बारहवीं के सीनियर छात्रों ने ‘सामाजिक बुराई’ जैसे गंभीर विषय पर अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति दर्ज कराई। बच्चों की कूची से उभरे चित्रों में समाज की कुरीतियों पर तीखा वार था और एक बेहतर कल की उम्मीद भी। जेसोवा की अध्यक्ष प्रीति कुमारी, कोषाध्यक्ष शिवानी सिंह, सदस्य नमिता सिंह और ऋचा संचिता ने जब इन कलाकृतियों का मूल्यांकन किया, तो बच्चों की गहराई और रचनात्मकता देखकर वे भी चकित रह गईं।
जब नन्हे विजेताओं के चेहरों पर चमकी मुस्कान
दिन ढलने पर जब परिणामों की घोषणा हुई, तो मेला परिसर में बच्चों और उनके अभिभावकों का उत्साह देखने लायक था। 7 से 10 वर्ष आयु वर्ग में जेवीएम सरला ग्लोबल की आद्याश्री, सरला ग्लोबल के अनुज और जेवीएम श्यामली की श्रेया तिवारी ने अपनी कला के दम पर पहला स्थान हासिल किया। इसी वर्ग में डीएवी कपिल देव की समृद्धि, केराली स्कूल के अर्क रंजन और डीएवी नंदराज के ओजस पांडेय दूसरे स्थान पर रहे, जबकि गुरु नानक स्कूल की अंशिका, डीपीएस दुर्गापुर की रंजना शाह और डीएवी नंदराज के आयुष कुमार ने तीसरा पुरस्कार अपने नाम किया।
10 से 12 वर्ष आयु वर्ग के कड़े मुकाबले में सृष्टि, डीएवी कपिल देव के आयुष आनंद और डीपीएस रांची की जया संतोष ने बाजी मारते हुए पहला स्थान पाया। विवेकानंद स्कूल के सुधांशु कुमार, जेवीएम की प्रिया अग्रवाल, जेवीएम के सौनेक और विवेकानंद स्कूल की अदिति को दूसरा पुरस्कार मिला। वहीं मॉडल स्कूल की सुनैना कुमार, केराली स्कूल के सक्षम प्रताप, अभिनूप सिन्हा, प्रियंका बेदिया और डीएवी कपिल देव की अमायरा ठाकुर संयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर रहीं। जब इन नन्हे कलाकारों को मंच पर सम्मानित किया गया, तो उनके चेहरों की चमक ने दिवाली के दीयों की रोशनी को भी मात दे दी। सच कहें तो जेसोवा दिवाली मेले का यह दूसरा दिन सिर्फ खरीदारी का बहाना नहीं, बल्कि संस्कृति, कला और बचपन की मासूम खुशियों का एक यादगार उत्सव बन गया।
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