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Chaibasa : चाईबासा का टाटा कॉलेज मैदान बुधवार सुबह कुछ अलग ही माहौल में था। दूर से गूंजती हेलीकॉप्टर की आवाज उस इलाके के लोगों के लिए सिर्फ आवाज नहीं थी। यह उनके दिलों में चल रही एक पुरानी बेचैनी और नई उम्मीद के बीच का पुल थी। हेलीकॉप्टर के जमीन छूते ही प्रशासन के अधिकारी कतारबद्ध खड़े हो गए, लेकिन आस-पास खड़े स्थानीय लोग भी यह देखना चाहते थे कि सुरक्षा का यह नया अध्याय अब किस दिशा में जाएगा।
सारंडा के लोगों की आंखों में सवाल, प्रशासन के हाथों में तैयारी
डीजीपी तदाशा मिश्रा हेलीकॉप्टर से उतरीं तो उनका स्वागत गुलदस्तों और सलामी से हुआ। पर उन आंखों की परछाईं, जिन्हें रोज जंगल के सन्नाटे के साथ जीना पड़ता है, शायद डीजीपी की नजरों से नहीं बची। यही लोग हैं जो कभी नक्सलियों की धमक, तो कभी सुरक्षा बलों के ऑपरेशन के बीच अपनी जिंदगी साधारण रखने की कोशिश करते हैं। डीजीपी का चाईबासा दौरा औपचारिक था, लेकिन इस औपचारिकता के पीछे एक असल वजह छिपी थी। सारंडा के उन गांवों में अब भी कुछ सवाल बाकी हैं। लोग जानना चाहते हैं कि कब उनके बच्चे बिना डर के स्कूल जा सकेंगे और कब जंगल सिर्फ जंगल रहेगा, डर का ठिकाना नहीं।
सभा में सिर्फ प्लान नहीं, मैदान की थकान भी बोली
पुलिस कार्यालय स्थित सभागार में जब बैठक शुरू हुई तो माहौल गंभीर था। नक्सल विरोधी अभियानों में लगे अधिकारी जानते थे कि रिपोर्ट सिर्फ कागज का बोझ नहीं होती, यह उन जवानों की थकान, उनकी रातों की दहशत और कभी-कभी उनके साथ लगी चोटों का दस्तावेज भी होती है। सारंडा जंगल की नक्शानवीसी सिर्फ पर्वत और घाटियों की नहीं, बल्कि खतरे की राहों की भी होती है। सर्च ऑपरेशन के दौरान कहां घात लग सकता है, किस पगडंडी पर जोखिम ज्यादा है, किस बस्ती में अब भी नक्सलियों की पकड़ बाकी है – यही सब बैठक में रखी गई असल बातें थीं।
डीजीपी का दृढ़ भरोसा – ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाएंगे नक्सली
तदाशा मिश्रा ने अधिकारियों से बात करते हुए सिर्फ आदेश नहीं दिए, बल्कि उनका लहजा साफ करता था कि वह मैदान की मुश्किलों को समझती हैं। उन्होंने कहा कि नक्सल विरोधी अभियान चुनौतियों से भरे होते हैं, लेकिन संयुक्त टीमों की कोशिशों ने कई महत्वपूर्ण जगहों पर भरोसे का माहौल बनाया है। उन्होंने साफ कहा कि सारंडा में सक्रिय नक्सली ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाएंगे। तैयारियां की जा चुकी हैं और हर चुनौती का विश्लेषण हो चुका है। जो समस्याएं सामने आईं, उन्हें दूर करने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। उनकी बातों में एक भरोसा था, जैसे वह यह कहना चाहती हों कि जंगल के भीतर छिपे खौफ को खत्म करने का समय अब ज्यादा दूर नहीं।
टीमवर्क की ताकत और इलाके की उम्मीद
बैठक में बैठे हर अधिकारी के सामने दो तस्वीरें थीं। एक तरफ इलाके की सुरक्षा, दूसरी तरफ वहां के नागरिकों की उम्मीद। डीजीपी ने टीमवर्क को सबसे बड़ी ताकत बताया। उनके शब्दों का सार यही था कि अभियान सिर्फ गोलियों और रणनीति से नहीं चलते, बल्कि एक साझा भरोसे से आगे बढ़ते हैं।
ये अधिकारी रहे मौजूद
बैठक में आईजी माइकल राज, आईजी साकेत कुमार, कोल्हान डीआईजी अनुरंजन किस्पोट्टा, एसपी अमित रेणु, सीआरपीएफ, कोबरा बटालियन और झारखंड जगुआर के वरिष्ठ अधिकारी और सभी एसडीपीओ उपस्थित थे।
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