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Chaibasa : सारंडा के जंगल सिर्फ पेड़ों और पहाड़ियों का विस्तार नहीं हैं। यह वह इलाका है, जहां सालों से डर और उम्मीद साथ-साथ चलते रहे हैं। माओवाद के साये में जीते इन जंगलों तक जब CRPF के DG ऑपरेशन ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह पहुंचे, तो यह दौरा केवल एक औपचारिक निरीक्षण नहीं रह, बल्कि यह उन लोगों के लिए एक संदेश था, जो लंबे समय से शांति का इंतजार कर रहे हैं।
नक्शों से आगे की समझ
चाईबासा में समीक्षा बैठक के दौरान नक्शे, रिपोर्ट और खुफिया इनपुट जरूर सामने थे, लेकिन बातचीत का फोकस सिर्फ ऑपरेशन तक सीमित नहीं रहा। CRPF के DG ऑपरेशन ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह ने अधिकारियों से साफ कहा कि दुर्गम इलाकों में सफलता तभी टिकाऊ होगी, जब सुरक्षा के साथ मानवीय संवेदनशीलता भी बराबर चले। उनका मानना है कि जंगलों में हर कदम सोच-समझकर बढ़ाना होगा, ताकि आम ग्रामीण खुद को अलग-थलग न महसूस करें।
आम आदमी पर दोहरी मार
सारंडा और कोल्हान के कई गांव ऐसे हैं, जहां पीढ़ियों ने बंदूक की आवाज सुनी है। एक तरफ माओवादियों का दबाव, दूसरी तरफ सुरक्षा अभियानों की अनिश्चितता। इस दोहरी मार में सबसे ज्यादा नुकसान आम लोगों का हुआ है। डीजी ऑपरेशन ने बैठक में इस बात पर जोर दिया कि अभियान का असली मकसद सिर्फ माओवादियों के किलवे को ढहाना नहीं, बल्कि उन हालात को बदलना है, जिन्होंने लोगों को डर में जीने पर मजबूर किया।
भरोसे की नींव पर सुरक्षा
सुरक्षा बलों को दिए गए निर्देशों में एक बात साफ रही। गांवों के साथ संवाद। सिंह ने कहा कि जब तक ग्रामीण खुद को सुरक्षित और सुना हुआ महसूस नहीं करेंगे, तब तक स्थायी शांति संभव नहीं है। इसी सोच के तहत कैंपों के आसपास चिकित्सा सहायता, प्राथमिक मदद और प्रशासनिक पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। कई गांवों में सुरक्षा बलों की मौजूदगी अब डर नहीं, बल्कि राहत के रूप में देखी जाने लगी है।
जंगलों में आगे बढ़ता ‘ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’
‘ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’ के तहत सुरक्षा बल उन इलाकों तक पहुंच बना रहे हैं, जिन्हें कभी माओवादियों का सुरक्षित ठिकाना माना जाता था। दुर्गम रास्ते, घना जंगल और सीमित संसाधन। इन चुनौतियों के बीच डीजी ऑपरेशन का संदेश साफ है कि जल्दबाजी नहीं, लेकिन दबाव लगातार बना रहना चाहिए। माओवादियों की सप्लाई चेन तोड़ना और उनकी गतिविधियों को सीमित करना इस अभियान का अहम हिस्सा है।
मार्च 2026 और शांति की उम्मीद
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मार्च 2026 तक माओवाद के खात्मे का लक्ष्य रखा है। ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह इसे सिर्फ समयसीमा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी मानते हैं। उनके अनुसार यह लड़ाई तभी पूरी होगी, जब जंगलों के गांवों में स्कूल खुलेंगे, इलाज समय पर मिलेगा और लोगों को रोजमर्रा की जिंदगी के लिए डर के साए में फैसले नहीं लेने पड़ेंगे। सारंडा के जंगल आज भी घने हैं, रास्ते कठिन हैं और चुनौतियां बड़ी हैं।
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