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Home » भूख से शुरू होती सुबह, उम्मीद पर खत्म होता दिन, कलपते चार बच्चों का सहारा बनी डालसा
Headlines

भूख से शुरू होती सुबह, उम्मीद पर खत्म होता दिन, कलपते चार बच्चों का सहारा बनी डालसा

January 25, 2026No Comments3 Mins Read
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Ranchi : रांची के बुढ़मू प्रखंड के सिदरोल गांव में एक टूटा-फूटा घर है, जिसकी छत हर वक्त गिरने का डर पैदा करती है। इसी घर में चार मासूम बच्चे रहते हैं। सबसे बड़ा बच्चा सिर्फ 14 साल का है, लेकिन वही इस छोटे से परिवार का सहारा भी है। मां आठ महीने पहले घर से निकल गई और फिर कभी वापस नहीं लौटी। पिता एक छोटे बच्चे को साथ लेकर रोज़गार की तलाश में बाहर चले गए। पीछे रह गए चार बच्चे, जिनकी दुनिया अब इसी जर्जर मकान तक सिमट गई है। सुबह होते ही 14 साल का बच्चा चूल्हा जलाता है। कभी इधर-उधर से मिले चावल, कभी किसी की दी हुई सब्जी। वही खाना बनाता है, वही छोटे भाई-बहनों को संभालता है। 12, 9 और 6 साल के ये बच्चे अब स्कूल की घंटी नहीं, बल्कि पेट की आवाज सुनकर दिन की शुरुआत करते हैं।

डर के साये में गुजरती रातें

बच्चों ने बताया कि बारिश की रातें सबसे मुश्किल होती हैं। तेज हवा चलती है तो छत की खपरैल हिलने लगती है। डर लगता है कि कहीं सब कुछ ऊपर ही न आ जाए। फिर भी ये बच्चे रोज़ इसी डर के साथ सो जाते हैं। सबसे बड़ा बच्चा कहता है, “बस इतना चाहता हूं कि घर गिरे नहीं और मेरे भाई-बहन सुरक्षित रहें।”

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मीडिया में छपी खबर बनी उम्मीद की किरण

सिदरोल गांव के इन बच्चों की कहानी मीडिया तक पहुंची। खबर पढ़ते ही झालसा यानी झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार के न्यायामूर्ति-सह-कार्यपालक अध्यक्ष सुजीत नारायण प्रसाद ने संज्ञान लिया। उनके निर्देश एवं सदस्य सचिव कुमारी रंजना अस्थाना के आदेश पर न्यायायुक्त सह रांची डालसा के अध्यक्ष अनिल कुमारा मिश्रा-1 के नेतृत्व और डालसा सचिव राकेश रौशन की देखरेख में टीम गठित की गई।

डालसा सचिव बनें बच्चों के नायक

आज यानी 25 जनवरी को डालसा सचिव राकेश रौशन अपनी टीम के साथ सिदरोल गांव पहुंचे। जर्जर मकान, टूटे हुए घर और डरे सहमे बच्चों को देखते ही उन्होंने तुरंत कार्रवाई शुरू की। बच्चों से बातचीत की, उनकी परेशानियों को समझा और तत्काल राहत देने की योजना बनाई। राकेश रौशन ने अपने नेतृत्व में बुढ़मू बीडीओ, डीसीपीओ और बाल कल्याण समिति (CWC) से संपर्क कर तुरंत गर्म कपड़े, खाना और देखभाल का इंतजाम करवाया। बच्चों की सुरक्षा और देखभाल सुनिश्चित करने के लिए दो लोकल पैरा लीगल वालंटियर (PLV) को तैनात किया गया। उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि जिन बच्चों के आधार कार्ड नहीं हैं, उनका निर्माण तुरंत किया जाए ताकि सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके।

पक्का घर और पढ़ाई की राह

राकेश रौशन ने यह सुनिश्चित किया कि बच्चों के लिए अंबेडकर आवास योजना के तहत जल्द ही सुरक्षित घर बने। आधार कार्ड बनने के बाद बच्चों को सीडब्ल्यूसी के माध्यम से स्पॉन्सरशिप योजना से जोड़ा जाएगा, जिसमें हर बच्चे को पढ़ाई के लिए चार हजार रुपये प्रति माह मिलेंगे। 12 साल की बच्ची को कस्तुरबा गांधी आवासीय विद्यालय में नामांकन कराना भी उन्होंने अपनी पहल से सुनिश्चित किया, ताकि उसका भविष्य सुरक्षित हो।

अभी सफर बाकी है, लेकिन उम्मीद जगी है

डालसा सचिव राकेश रौशन की सक्रियता और मानवता ने इन बच्चों की जिंदगी में पहली बार राहत की किरण पहुंचाई। माता-पिता से संपर्क  होने तक सिदरोल मुखिया अनुपा उरांव को बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

इसे भी पढ़ें : मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की का बड़ा बयान, कल ग्राम सभा और मनरेगा पर होगा फैसला

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