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Garhwa (NityaNand Dubey) : गढ़वा का जतरो बंजारी गांव। तारीख थी 6 मई 2022… आधी रात का सन्नाटा था। घरों की बत्तियां बुझ चुकी थीं। उसी सन्नाटे में 22 साल का विकास रजवार घर से निकला। परिजनों से कहा, “जरा बाहर तक जा रहा हूं।” किसी को क्या पता था कि यह उसकी जिंदगी की आखिरी रात होगी। सुबह हुई तो विकास घर नहीं लौटा। पहले लगा कहीं दोस्तों के पास रुक गया होगा। लेकिन जैसे-जैसे घंटे बीतते गए, घर की बेचैनी डर में बदलने लगी।
प्रेम, परिवार और टकराव
गांव में चर्चा थी कि विकास का संबंध उसी गांव की माया कुमारी से था। दोनों एक-दूसरे से मिलते थे। यह बात माया के भाइयों, सुनील और संजय रजवार, को मंजूर नहीं थी। उस रात भी विकास माया से मिलने गया था। लेकिन किस्मत ने करवट बदल ली। माया के मुताबिक, दोनों भाई अचानक वहां पहुंच गए। पहले बहस हुई, फिर हाथापाई। गुस्सा इतना बढ़ा कि हालात बेकाबू हो गए। विकास का सामान वहीं गिर गया। घड़ी, बेल्ट, लोटा, मोबाइल। और फिर दोनों भाई उसे जबरन अंधेरे में ले गए। उस अंधेरे से विकास कभी लौटकर नहीं आया।
गुमशुदगी से हत्या तक
विकास के पिता रामाश्रय रजवार ने बरडिहा थाने में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने खोजबीन शुरू की। गांव में तरह-तरह की बातें होने लगीं। जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, शक की सुई सीधे सुनील और संजय पर आकर टिक गई। पूछताछ तेज हुई। आखिरकार दोनों टूट गए। पुलिस के सामने सच सामने आया।उनकी निशानदेही पर पुलिस ने विकास का शव बरामद किया। गांव में सनसनी फैल गई। जो बात लोग फुसफुसाकर कह रहे थे, वह अब हकीकत बन चुकी थी।
सबूतों ने खोली साजिश की परतें
मामला सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा। घटनास्थल से मिले सामान, FSL रिपोर्ट और तकनीकी साक्ष्यों ने कहानी की हर कड़ी जोड़ दी। कुल 11 गवाह अदालत में पेश हुए। हर बयान ने एक ही तस्वीर साफ की, यह हत्या अचानक नहीं हुई थी। गुस्से और तथाकथित इज्जत के नाम पर रची गई साजिश थी। अदालत ने माना कि दोनों भाइयों ने मिलकर विकास की जान ली। भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 के तहत उन्हें दोषी ठहराया गया।
अदालत ने सुनाई उम्रकैद की सजा
करीब तीन साल तक चली सुनवाई के बाद अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (चतुर्थ) आशुतोष कुमार पांडे की अदालत ने फैसला सुनाया। दोनों भाइयों को उम्रकैद की सजा दी गई। मतलब कि दोनों भाइयों को उम्रभर ‘लाल कोठी’ यानी जेल में रहना पड़ेगा। साथ ही 20-20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। 10 मई 2022 से ही वे न्यायिक हिरासत में थे। अब उनकी बाकी जिंदगी जेल की सलाखों के पीछे कटेगी।
एक परिवार उजड़ा, दूसरा बिखर गया
विकास का परिवार आज भी उस रात को याद कर सिहर उठता है। एक बेटा गया, घर की रौनक चली गई। दूसरी तरफ, एक ही घर के दो बेटे उम्रकैद की सजा पा चुके हैं। एक बहन, जिसके नाम पर यह सब हुआ, अब समाज की नजरों में है। यह कहानी सिर्फ एक हत्या की नहीं है। यह कहानी है उस सोच की, जहां प्रेम को अपराध और हिंसा को समाधान समझ लिया जाता है। गढ़वा की यह वारदात याद दिलाती है कि गुस्से का एक पल, कई जिंदगियां बर्बाद कर देता है। कानून देर से सही, लेकिन जवाब जरूर देता है।
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