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Ranchi : जब हाथों में रंग हों, मन में सवाल हों और आंखों में बेहतर भविष्य का सपना हो, तब बदलाव की शुरुआत होती है। रांची में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जहां स्कूल की छात्राओं से लेकर बाजार में खरीदारी करने आए आम लोग तक नशे के खिलाफ एक सुर में खड़े दिखे। मौका था नालसा की डॉन योजना 2025 के तहत चल रहे नशा उन्मूलन जागरूकता अभियान का।
जब छात्राओं ने कागज पर उतारा दर्द और उम्मीद
कस्तुरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय, कांके की कक्षा में उस दिन पढ़ाई के साथ सोच भी चल रही थी। छात्राओं ने नशे के दुष्प्रभाव को सिर्फ शब्दों में नहीं, बल्कि चित्रों में जिया। किसी ने टूटते परिवार को रंगों से दिखाया, तो किसी ने स्वस्थ जीवन की तस्वीर बनाई। निबंध और चित्रांकन प्रतियोगिता में भाग लेती छात्राओं के चेहरे पर उत्साह साफ दिख रहा था। कार्यक्रम के दौरान पीएलवी ने उन्हें समझाया कि नशा सिर्फ शरीर को नहीं, सपनों को भी कमजोर करता है। छात्राओं ने भी खुलकर सवाल पूछे और अपने अनुभव साझा किए।
जागरूकता जो सिर्फ जानकारी नहीं, संवाद बनी
विद्यालय परिसर में मौजूद पीएलवी ने बेहद सरल भाषा में नशे से होने वाले शारीरिक और मानसिक नुकसान के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि सही समय पर जागरूकता मिल जाए, तो कई जिंदगियां भटकने से बच सकती हैं। छात्राओं को यह भी जानकारी दी गई कि नशामुक्ति केंद्रों में इलाज की सुविधा उपलब्ध है और जरूरत पड़ने पर मदद ली जा सकती है।

स्कूल की दीवारों से निकलकर बाजार तक पहुंचा संदेश
नशा उन्मूलन की यह पहल सिर्फ स्कूलों तक सीमित नहीं रही। डोरण्डा के वेन्डर मार्केट में रंग दर्पन रांची की नुक्कड़ नाटक टीम ने जब अभिनय शुरू किया, तो राह चलते लोग भी ठहर गए। कलाकारों ने आम जिंदगी की कहानी के जरिए दिखाया कि कैसे नशा एक व्यक्ति ही नहीं, पूरे परिवार को तोड़ देता है। नाटक खत्म होते ही लोगों की आंखों में सोच थी और चेहरे पर गंभीरता। कई युवाओं ने कलाकारों से बात की और अभियान की सराहना की।
कानून से जुड़ी जागरूकता, इंसानियत के साथ
डालसा रांची के पीएलवी पूरे अभियान के दौरान सिर्फ वक्ता नहीं, मार्गदर्शक की भूमिका में दिखे। उन्होंने बताया कि नालसा की डॉन योजना का मकसद डर नहीं, समझ पैदा करना है। बच्चों और युवाओं को यह एहसास कराना कि उनका जीवन कीमती है और नशा उसे बर्बाद कर सकता है।
एक छोटी पहल, बड़ा असर
इस पूरे कार्यक्रम ने यह साफ कर दिया कि नशा उन्मूलन की लड़ाई पोस्टर या भाषण से नहीं, बल्कि संवेदनशील संवाद से जीती जा सकती है। जब छात्राएं अपने चित्रों में भविष्य सजाती हैं और कलाकार सड़क पर सच दिखाते हैं, तब उम्मीद मजबूत होती है। रांची में शुरू हुई यह पहल न सिर्फ एक कार्यक्रम रही, बल्कि एक संदेश बन गई कि बदलाव संभव है, अगर उसे इंसानी एंगल के साथ छुआ जाए।
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