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Pakur : सुबह की हल्की धूप आंगन में फैल चुकी थी। घर के अंदर एक बूढ़ी मां अपने पति की पुरानी तस्वीर को निहार रही थी। यह तस्वीर उस इंसान की थी, जिसने कभी देश की आज़ादी के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया था। आज गणतंत्र दिवस था, और आज ही उसके संघर्ष को एक बार फिर याद किया जाना था।

जब दस्तक ने लौटा दी यादें
जैसे ही दरवाजे पर दस्तक हुई, वह धीरे-धीरे उठीं। सामने खड़े थे अनुमंडल पदाधिकारी साईमन मरांडी और अंचलाधिकारी कुमार अरविन्द बेदिया। हाथों में सम्मान की शॉल और आंखों में सम्मान का भाव। अधिकारी ने कहा, “हम आपके पति के त्याग को नमन करने आए हैं।” इतना सुनते ही उनकी आंखें भर आईं। वर्षों से सहेजे गए दर्द, संघर्ष और गर्व की भावनाएं एक साथ छलक पड़ीं।

संघर्ष भरी थी हर कहानी
यह सिर्फ एक घर की कहानी नहीं थी। ऐसे कई घर थे, जहां आज भी आज़ादी की लड़ाई की यादें जिंदा हैं। किसी के पिता जेल गए थे, तो किसी के दादा ने आंदोलन में हिस्सा लिया था। किसी ने खेत छोड़े, किसी ने नौकरी। किसी ने तो अपना बचपन ही देश पर न्योछावर कर दिया। आज उनके परिवार वही किस्से दोहराते हैं, जिनमें भूख, डर और हिम्मत की कहानियां छुपी हैं।
सम्मान से बढ़कर मिला अपनापन
जब अधिकारियों ने शॉल ओढ़ाई, तो वह सिर्फ एक कपड़ा नहीं था। वह वर्षों की उपेक्षा के बाद मिला अपनापन था। वह एहसास था कि देश ने उन्हें भुलाया नहीं है। एक शहीद के बेटे ने कहा, “पिता जी तो चले गए, लेकिन आज ऐसा लगा जैसे सरकार ने उन्हें फिर से याद कर लिया हो।”

पीढ़ियों तक पहुंचेगी यह विरासत
इस मौके पर अधिकारियों ने परिवार के बच्चों से भी बात की। उन्होंने कहा, “आपके बुजुर्गों ने जो किया, वही हमारी असली पूंजी है। इसे कभी भूलना मत।” बच्चों की आंखों में गर्व साफ दिखाई दे रहा था। शायद आज पहली बार उन्होंने अपने दादा-परदादा को सिर्फ एक तस्वीर नहीं, बल्कि एक नायक के रूप में देखा।
एक दिन नहीं, हर दिन सम्मान जरूरी
गणतंत्र दिवस का यह आयोजन सिर्फ एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था। यह उन अनकहे बलिदानों को आवाज देने का प्रयास था, जो इतिहास की किताबों में दर्ज नहीं हो पाए। स्थानीय लोगों का कहना था कि ऐसे कार्यक्रम साल में एक दिन नहीं, बल्कि हर दिन होने चाहिए। ताकि कोई भी स्वतंत्रता सेनानी का परिवार खुद को अकेला महसूस न करे।
जब सम्मान बन गया प्रेरणा
कार्यक्रम के अंत में जब अधिकारी विदा हुए, तो कई आंखें नम थीं, लेकिन दिल संतोष से भरे थे। यह संतोष इस बात का था कि आज़ादी की विरासत अभी जिंदा है।
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