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Pakur : पाकुड़ में इस साल त्योहारों की रौनक कुछ अलग थी। दुर्गापूजा, काली पूजा और छठ महापर्व के पूरे डेढ़ महीने में जिले ने ना सिर्फ भव्य पंडाल देखे, बल्कि एक ऐसा माहौल भी महसूस किया जिसमें सुरक्षा, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी साफ दिखी।
शुक्रवार को बाजार समिति परिसर में जब जिला प्रशासन ने पूजा समितियों को सम्मानित किया, तो मंच पर सिर्फ ट्रॉफियां नहीं थीं। वहां उन लोगों का सम्मान था, जिन्होंने अपनी रातें जागकर, सड़क पर खड़े रहकर और पंडालों में पसीना बहाकर यह पूरे आयोजन को सफल बनाया। डीसी मनीष कुमार, उप विकास आयुक्त महेश कुमार संथालिया और अन्य अधिकारियों ने सभी समितियों को शॉल, मोमेंटो और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया।
मंच पर सम्मान, पीछे महीनों की एकजुट मेहनत
डीसी मनीष कुमार जब माइक पर आए, तो भीड़ में कई चेहरे चमक उठे। वे वही लोग थे, जिनसे प्रशासन हर दिन फोन पर समन्वय करता था। मजिस्ट्रेट, पुलिसकर्मी, नव नियुक्त चौकीदार, सफाईकर्मी, स्वयंसेवक, कलाकार और वे कारीगर जो बांस और थर्मोकोल से सपनों जैसे पंडाल खड़े करते हैं। अधिकांश लोग इन चेहरों को कभी नहीं पहचान पाते, लेकिन यही लोग त्योहारों को सुरक्षित और यादगार बनाते हैं। डीसी ने जब उनके योगदान का जिक्र किया, तो मंच के नीचे बैठे लोग चुपचाप मुस्कुरा उठे। कुछ की आंखों में हल्की नमी भी थी।

पंडालों में कला, संदेश और गांव का गौरव
इस बार पंडालों में सिर्फ रोशनी नहीं थी। कई समितियों ने रक्तदान, स्वच्छता और समाज सुधार से जुड़े संदेश अपनी थीम में शामिल किए। अमड़ापाड़ा के प्रथम पुरस्कार विजेता पंडाल ने ग्रामीण कारीगरों की मेहनत को उभारते हुए लकड़ी और मिट्टी की पारंपरिक संरचना बनाई थी। डाक-बंगला हिरणपुर की टीम ने कहते हुए ट्रॉफी ली, “पुरस्कार तो मिला ही, लेकिन सबसे बड़ी खुशी ये थी कि लोग हर दिन यहां आकर बैठते थे। गाँव जैसा अपनापन महसूस होता था।”
छोटे पंडाल, लेकिन बड़े काम
छोटे पंडालों की लंबी सूची ने साबित कर दिया कि त्योहार का मतलब सिर्फ भव्यता नहीं होता। काठशाला, चांदपुर, तालपहाड़ी, सिलमपुर जैसे पंडाल शायद शहर के लोगों को बड़े आयोजनों की तरह आकर्षित न करें, लेकिन इन समितियों ने सफाई, व्यवस्था और सामुदायिक जुड़ाव में कोई कमी नहीं छोड़ी। एक समिति सदस्य ने कहा, “हम बड़ा पंडाल नहीं बना सकते, लेकिन अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हैं।”
छठ के घाटों पर अनकही कहानियां
छठ पूजा हमेशा से अनुशासन और आस्था का पर्व रहा है। इस साल भी कालीभाषन पोखर, अधाड़ी पोखर और टीन बंगला पोखर की समितियों ने कई दिनों तक सफाई, लाइट, सुरक्षा और पानी की व्यवस्था बिना किसी शिकायत के संभाली। ग्वालपाड़ा के एक स्वयंसेवक ने मुस्कुराते हुए कहा, “घाट सजाने में थकान तो होती है, लेकिन जब सूरज उगता है और व्रती लोग हाथ जोड़ते हैं, तब लगता है हमारा काम सफल हुआ।”

क्यों खास था यह समारोह
यह सिर्फ एक पुरस्कार वितरण नहीं था। यह उन लोगों को खुले मंच पर धन्यवाद कहने का दिन था, जिनकी मेहनत अक्सर भीड़ में खो जाती है। कई समितियों के प्रतिनिधि पहली बार इतने बड़े मंच पर पहुंचे थे। कुछ के लिए यह सम्मान उनके गांव की पहचान बन गया।
पुकार जो हर साल दोहराई जाती है
त्योहार आते रहेंगे, पंडाल सजते रहेंगे, और भीड़ उमड़ती रहेगी। लेकिन इन आयोजनों की रीढ़ वही लोग हैं, जो बिना नाम चाहे काम करते हैं। इस साल पाकुड़ ने उन्हें पहचाना, सराहा और सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया। शांतिपूर्ण त्योहार सिर्फ प्रशासन की सफलता नहीं, बल्कि पूरे जिले की सामूहिक जीत भी थी।
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