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Koderma (Aftab Alam) : खेत तैयार हैं। बीज घरों में रखे हैं। किसान हर सुबह आसमान की ओर देखते हैं और यही उम्मीद करते हैं कि आज बादल मेहरबान होंगे। इस बार मानसून ने जून में कोडरमा के किसानों को निराश किया। जितनी बारिश की जरूरत थी, उसका आधा भी पानी नहीं बरसा। खेतों में नमी की कमी रही और कई जगह बुवाई समय पर शुरू ही नहीं हो सकी। अब पूरा भरोसा जुलाई की बारिश पर टिका है। पिछले दो दिनों से हुई लगातार बारिश ने किसानों के चेहरे पर थोड़ी राहत जरूर दी है, लेकिन खेती की असली तस्वीर आने वाले दिनों की बारिश तय करेगी।
जिले में जून महीने के दौरान सामान्य तौर पर करीब 140 मिलीमीटर बारिश होती है, लेकिन इस बार सामान्य से 43 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई। मौसम की इस बेरुखी ने खेती की रफ्तार धीमी कर दी। जिन किसानों ने समय से धान की नर्सरी तैयार कर ली थी, वे भी पर्याप्त पानी नहीं मिलने से परेशान रहे। कई गांवों में किसान बारिश का इंतजार करते रहे और खेतों में बुवाई टालनी पड़ी।
अब जुलाई ही तय करेगा खेती की दिशा
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खरीफ खेती के लिए जुलाई सबसे अहम महीना होता है। इसी दौरान अच्छी बारिश होने पर खेतों में नमी बनी रहती है और धान समेत दूसरी फसलों की बुवाई तेजी से पूरी होती है। कोडरमा जिले में जुलाई के दौरान सामान्य रूप से करीब 245 मिलीमीटर बारिश होती है। अभी तक यानी 6 जुलाई तक विभिन्न प्रखंडों में लगभग 30 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई है। पिछले दो दिनों की लगातार बारिश ने खेतों में नमी जरूर बढ़ाई है। कई किसानों ने दोबारा खेतों की तैयारी शुरू कर दी है। जिन खेतों में बुवाई रुकी हुई थी, वहां अब काम धीरे-धीरे शुरू होने लगा है। हालांकि किसान यह भी मानते हैं कि सिर्फ दो दिन की बारिश से पूरी स्थिति नहीं बदलेगी। अगर पूरे जुलाई में अच्छी और नियमित बारिश होती रही, तभी खरीफ फसल पटरी पर लौट पाएगी।
कृषि विभाग भी बदल रहा रणनीति
बारिश के बदलते मिजाज को देखते हुए कृषि विभाग ने भी अपनी रणनीति बदल दी है। विभाग किसानों को सिर्फ धान पर निर्भर नहीं रहने की सलाह दे रहा है। अधिकारियों का कहना है कि मौसम अब पहले जैसा नहीं रहा। इसलिए खेती में भी बदलाव जरूरी है। बीज विनिमय योजना के तहत किसानों के बीच विभिन्न फसलों के बीज वितरित किए जा रहे हैं। साथ ही कृषि वैज्ञानिक गांव-गांव जाकर किसानों को वैकल्पिक खेती की जानकारी दे रहे हैं। कोशिश यही है कि अगर बारिश कम भी हो तो किसानों की आमदनी पूरी तरह प्रभावित न हो।
मोटे अनाज की खेती पर बढ़ा जोर
इस बार कृषि विभाग मोटे अनाज की खेती को विशेष प्राथमिकता दे रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मोटे अनाज कम पानी में भी अच्छी पैदावार दे सकते हैं। बदलते मौसम और अनिश्चित मानसून को देखते हुए विभाग ने इस वर्ष मोटे अनाज की बुवाई का लक्ष्य भी बढ़ा दिया है। अधिकारियों का मानना है कि अगर किसान धान के साथ-साथ मोटे अनाज और दूसरी कम पानी वाली फसलों को भी अपनाते हैं तो मौसम की मार से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
बारिश सिर्फ मौसम नहीं, गांव की अर्थव्यवस्था भी तय करती है
ग्रामीण इलाकों में बारिश सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं होती। अच्छी बारिश होती है तो खेतों में काम बढ़ता है, मजदूरों को रोजगार मिलता है, बाजारों में रौनक लौटती है और गांव की अर्थव्यवस्था भी गति पकड़ती है। लेकिन बारिश कम हो जाए तो इसका असर खेती से लेकर रोजी-रोटी तक पर दिखाई देने लगता है।
फिलहाल कोडरमा के किसानों की उम्मीदें जुलाई के बादलों से जुड़ी हैं। जून ने जरूर निराश किया, लेकिन जुलाई की शुरुआत ने उम्मीद की एक नई किरण दिखाई है। अब सबकी नजर आने वाले दिनों पर है। अगर बादल इसी तरह बरसते रहे तो खेत फिर से हरे होंगे और किसानों की मेहनत रंग लाएगी। लेकिन अगर बारिश ने फिर साथ नहीं दिया तो खरीफ सीजन पर संकट और गहरा सकता है।
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