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Ranchi : ठंडी हवा पहाड़ों से उतरकर लोदांबेड़ा और बरूबेदा गांव की कच्ची गलियों में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही थी। सुबह–सुबह जलती लकड़ियों के पास हाथ सेंकते लोग शायद नहीं जानते थे कि इस दिन उनकी जिंदगी में थोड़ी सी गर्माहट पुलिस की ओर से भी मिलने वाली है। उग्रवाद से लंबे समय से प्रभावित रहे इन गांवों में डर और असुरक्षा की एक परत हमेशा रहती है। लेकिन शुक्रवार की दोपहर जब बुढ़मू और केरेडारी थाना की टीम गांव पहुंची, तो लोगों के चेहरों पर सावधानी से भरी उत्सुकता साफ दिखाई दे रही थी। पुलिस की जीपों से कंबल उतारते जवानों को देखकर गांव की बुजुर्ग महिलाएं सबसे पहले पास आईं, कुछ हिचकते कदमों से, कुछ उम्मीद भरी निगाहों में।
“हमको भी कोई याद करता है…”
70 वर्ष की एक बूढ़ी दादी कंबल पाकर भावुक हो गयी और बोली- “ठंड तो हर साल लगती है, पर हमको भी कोई याद करता है, यह कम नहीं है। पुलिस आज हमारे घर आई है खुशी लेकर।” उनके शब्द गांव के अधिकांश लोगों के मन की बात बयान कर रहे थे।
कंबल ही नहीं, जागरूकता भी पहुंची
सामुदायिक पुलिसिंग कार्यक्रम के तहत जरूरतमंद परिवारों को कंबल बांटे गए, लेकिन यह वितरण सिर्फ राहत का काम नहीं था। पुलिस अधिकारियों ने ग्रामीणों को नशा से दूर रहने और नशीले पदार्थों की खेती के दुष्परिणाम समझाए। यही नहीं, उन्होंने उग्रवादियों के बहकावे में न आने और विकास की मुख्यधारा से जुड़ने की अपील की। पुलिस अधिकारियों ने साफ कहा, “इस इलाके के बदलाव की चाबी आप लोगों के हाथों में है। हम सुरक्षा भी देंगे और साथ भी।”

डर की जगह भरोसा, धीरे-धीरे बदलता माहौल
कभी जहां पुलिस की मौजूदगी से डर का साया मंडराता था, वहीं अब बच्चे भी कार्यक्रम में उत्सुकता से शामिल होते दिखे। कई महिलाओं ने कहा कि पहले वे समस्याएं बताने में डरती थीं, लेकिन अब पुलिस से बात करना आसान लगता है। दिन ढलने लगा तो कार्यक्रम समाप्त हो गया, लेकिन कई ग्रामीण अब भी कंबल कसकर अपने कंधों पर लपेटे बैठे थे। उनके चेहरों पर वही बात साफ लिखी थी… उम्मीद की लौ जब जलती है, तो सबसे घने अंधेरे में भी रोशनी दिखाई देती है।

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