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Ramgarh (Dharmendra Pradhan) : लोहा गलाने वाली भट्ठियों की तपन, मशीनों का लगातार शोर और रोज का तय टारगेट—एक औद्योगिक इकाई में काम करने वाले मजदूर की दिनचर्या कुछ ऐसी ही होती है। इस आपाधापी में अक्सर जिस चीज को सबसे पहले नजरअंदाज किया जाता है, वह है खुद की सेहत। शरीर में कोई बीमारी धीरे-धीरे घर बना रही होती है और इंसान काम के बोझ तले उसे थकान समझकर टालता रहता है। इसी लापरवाही को समय रहते रोकने के लिए बिहार फाउंड्री एंड कास्टिंग्स लिमिटेड (बीएफसीएल) के परिसर में एक खास पहल देखने को मिली। कंपनी के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा परियोजना बाह्य रोगी स्वास्थ्य केंद्र (एचएएसपी ओएचसी) की ओर से प्रशासनिक भवन में एक सघन स्वास्थ्य जांच शिविर लगाया गया, जहां एक-एक कर कुल 70 कर्मचारियों की सेहत का पूरा कच्चा-चिट्ठा परखा गया।
चेहरे पर काम का दबाव, रिपोर्ट में सामने आई अंदरूनी उलझन
शिविर की कमान संभाले हुए थे चिकित्साधिकारी डॉ. लेख राज। सुबह से ही कर्मचारी बारी-बारी से अपने रूटीन चेकअप के लिए पहुंच रहे थे। सामान्य शारीरिक जांच के अलावा सबसे ज्यादा जोर इस बात पर था कि शरीर के बुनियादी पैमाने दुरुस्त हैं या नहीं। जब डिजिटल मशीनों ने रक्तचाप (बीपी) और खून में शुगर की मात्रा नापनी शुरू की, तो कई नतीजे चौंकाने वाले रहे।

जांच में शामिल 70 लोगों में से 6 कर्मचारी ऐसे निकले जिनका ब्लड प्रेशर सामान्य से कहीं ज्यादा दर्ज किया गया। वहीं दो कर्मचारियों के खून में शुगर का स्तर खतरे के निशान से ऊपर पाया गया। इनमें से ज्यादातर कर्मियों को इस बात का अंदाजा तक नहीं था कि वे भीतर ही भीतर साइलेंट किलर बन चुकी इन बीमारियों की गिरफ्त में आ रहे हैं।
डॉक्टर की दो टूक: काम जरूरी है, लेकिन जिंदगी उससे ज्यादा कीमती
रिपोर्ट सामने आने के बाद डॉ. लेख राज ने प्रभावित कर्मचारियों को अलग बैठाकर तसल्ली से समझाया। उन्होंने साफ लफ्जों में कहा कि आज के दौर में तनाव, अनियमित खानपान और अधूरी नींद की वजह से बीपी और शुगर का बढ़ना बहुत आम हो गया है। परेशानी यह नहीं है कि बीमारी के लक्षण दिखे हैं, असल मुसीबत तब होती है जब हम इसे नजरअंदाज कर देते हैं।
डॉक्टरों की टीम ने इन आठों कर्मचारियों को तुरंत जरूरी चिकित्सकीय सलाह दी और आगे की नियमित जांच के लिए जरूरी दिशा-निर्देश तय किए। उन्हें समझाया गया कि बिना देर किए दवाओं का सही रूटीन शुरू करना और जीवनशैली में बदलाव लाना ही आगे के बड़े खतरों से बचा सकता है।
थाली में बदलाव और हर दिन थोड़ी कसरत, यही है असली बचाव
शिविर सिर्फ दवा की पर्ची थमाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक तरह की हेल्थ क्लास में तब्दील हो गया। मौके पर मौजूद कर्मचारियों को बताया गया कि काम के बीच में अपनी दिनचर्या को कैसे संतुलित रखा जाए। डॉ. लेख राज और उनकी टीम ने कर्मियों से कहा कि वे अपनी थाली से ज्यादा नमक, तेज मसाले और अधिक मीठे को बाहर का रास्ता दिखाएं।
खाने में हरी सब्जियां और पौष्टिक चीजें बढ़ाने, भरपूर पानी पीने और दिनभर में कम से कम 20 से 30 मिनट हल्की कसरत या तेज चाल चलने की आदत डालने को कहा गया। कर्मचारियों को यह बात गहराई से समझाई गई कि साल में कम से कम दो बार पूरी जांच कराना उतना ही जरूरी है जितना कि फैक्ट्री की मशीनों की समय पर सर्विसिंग कराना।
समय पर पहचान ही सुरक्षा की सबसे बड़ी गारंटी
बीएफसीएल के प्रबंधन की इस पहल ने एक सीधा और साफ संदेश दिया कि कर्मचारी की सेहत ही किसी भी उद्योग की असली ताकत होती है। अगर शुरुआती दौर में ही बीमारी पकड़ में आ जाए, तो न केवल एक इंसान की जान सुरक्षित रहती है बल्कि पूरा परिवार आने वाली मानसिक और आर्थिक परेशानी से बच जाता है। शिविर खत्म होने तक कर्मियों के मन से अस्पतालों का डर दूर हुआ और उन्होंने माना कि काम की रफ्तार के बीच थोड़ा वक्त अपनी सेहत को देना वाकई फायदे का सौदा है।
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