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Giridih : कभी लाल आतंक की पहचान रहे पारसनाथ पर्वत की घाटियों में बुधवार को एक नई सुबह उतरी। वो धरती, जहाँ कभी गोलियों की गूंज हुआ करती थी, आज आत्मसमर्पण की शपथ से गूंज उठी। सरकार की “दिशा – एक नई पहल” योजना से प्रेरित होकर भाकपा (माओवादी) संगठन के हार्डकोर सदस्य शिवलाल हेम्ब्रम उर्फ शिवा और उनकी पत्नी सरिता हांसदा उर्फ उर्मिला ने हथियार छोड़, शांति और जीवन का रास्ता चुना।
लाल रास्ते से लौटने की कहानी
गिरिडीह के पपरवाटांड़ स्थित नए पुलिस लाइन में बुधवार को जब शिवा और उर्मिला ने हथियार जमीन पर रखे, तो उनके चेहरे पर वर्षों की थकान थी, मगर आंखों में उम्मीद की नमी भी थी। कभी जंगलों में बंदूक थामने वाले इस दंपत्ति ने अब जीवन की नई शुरुआत की ओर कदम बढ़ाया।
दोनों को सीआरपीएफ के डीआईजी अमित सिंह, डीसी राम निवास यादव और पुलिस अधीक्षक डॉ. विमल कुमार ने मुख्यधारा में लौटने पर स्वागत किया। आत्मसमर्पण समारोह के दौरान उपस्थित अधिकारी और ग्रामीणों ने तालियों से उनका अभिनंदन किया — जैसे गिरिडीह ने खुद अपने एक भूले-बिसरे बेटे-बेटी को वापस पा लिया हो।
अपराध से अहसास तक
शिवलाल हेम्ब्रम — भाकपा माओवादी की एरिया कमेटी का सक्रिय सदस्य — और सरिता हांसदा, पीरटांड क्षेत्र में कुख्यात नक्सली विवेक दा के दस्ते की सदस्य रही हैं। दोनों के खिलाफ कुल 15 मामले दर्ज हैं — 11 शिवा के नाम और 4 सरिता के खिलाफ। खुखरा थाना क्षेत्र के रहने वाले ये दोनों उस दौर के साक्षी रहे हैं, जब गिरिडीह की पहाड़ियां नक्सली ठिकानों से भरी थीं।
लेकिन वक्त के साथ बदलाव की दस्तक उन तक भी पहुंची। सरिता ने आत्मसमर्पण के बाद कहा — “हमने देखा कि जो रास्ता हमने चुना था, उसने सिर्फ जान ली, जीवन नहीं दिया। अब अपने बच्चों को बंदूक नहीं, किताब देना चाहती हूं।”
सरकार की नई पहल – नई दिशा
राज्य सरकार की “दिशा – एक नई पहल” योजना के तहत दोनों को ₹50,000-₹50,000 की पुनर्वास राशि दी गई है। साथ ही शिक्षा, रोजगार और पुनर्वास के अन्य लाभ भी सुनिश्चित किए जाएंगे।
यह पहल उन लोगों के लिए है जो हिंसा छोड़कर समाज में सम्मानपूर्वक लौटना चाहते हैं।
डीआइजी अमित सिंह ने इस मौके पर कहा — “झारखंड बंद का आह्वान अब अर्थहीन है। जिनके पास अब भी मौका है, वो लौट आएं। सरकार का दरवाज़ा खुला है — ताकि जंगलों की जगह खेतों में हरियाली लौटे।”
लाल गलियारे का पतन
पारसनाथ जोन कभी नक्सलियों की समानांतर सत्ता का प्रतीक था। लेकिन अब वो कहानी इतिहास बनती जा रही है। सीआरपीएफ, झारखंड पुलिस और आईबी के संयुक्त अभियानों ने इस इलाके को लगभग नक्सलमुक्त बना दिया है। पिछले एक वर्ष में ही 15 में से 12 वांछित नक्सली मुठभेड़ों में ढेर हो चुके हैं। 15 सितंबर को एक करोड़ के इनामी नक्सली सहदेव सोरेन के मारे जाने के बाद पारसनाथ की पहाड़ियाँ एक बार फिर शांत दिखने लगी हैं।
उम्मीद की एक सुबह
शिवा और उर्मिला के आत्मसमर्पण ने न केवल गिरिडीह बल्कि पूरे झारखंड को संदेश दिया है कि बंदूक की राह चाहे जितनी लंबी हो, अंत में इंसान को लौटना अपने ही गांव, अपने ही लोगों के पास होता है।
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