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Ranchi : झारखंड की ग्रामीण विकास एवं पंचायत राज मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने स्विट्ज़रलैंड के शांत शहर लुसर्न में जब माइक संभाला, तो सभागार में सन्नाटा था। सामने बैठे 47 देशों के प्रतिनिधि उनके हर शब्द को ध्यान से सुन रहे थे — क्योंकि वह सिर्फ़ एक मंत्री नहीं, बल्कि हर उस महिला की आवाज़ थीं जो ऑनलाइन दुनिया में अपमान और डर का सामना कर रही है।
“डिजिटल दुनिया ने हमें सशक्त किया, लेकिन डर भी दिया”
दीपिका पांडेय सिंह ने अपने भाषण की शुरुआत एक सवाल से की… “क्या हम सच में उतने सुरक्षित हैं, जितना यह डिजिटल युग दिखता है?” उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया, जो कभी अभिव्यक्ति का मंच था, अब अक्सर उत्पीड़न और मानसिक हिंसा का अड्डा बन गया है। उनकी आवाज़ में दृढ़ता थी— “ऑनलाइन लैंगिक हिंसा सिर्फ़ व्यक्तिगत नहीं, यह लोकतंत्र और समान भागीदारी पर हमला है।”
भारत की हकीकत… आंकड़े जो सोचने पर मजबूर करते हैं
मंत्री ने मंच पर ऐसे तथ्य साझा किए जिन्होंने पूरे सभागार को झकझोर दिया —
- भारत में 85% महिलाएँ किसी न किसी रूप में ऑनलाइन उत्पीड़न का शिकार हुई हैं।
- 54% महिलाएं तकनीक-आधारित हिंसा का सामना कर चुकी हैं।
- 65% महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर इसका असर पड़ा, जबकि सिर्फ 30% ही शिकायत दर्ज करा सकीं।
उन्होंने कहा… “यह सिर्फ़ आंकड़े नहीं हैं, ये उस चुप्पी की कहानी हैं जो एक महिला अपने भीतर रोज़ झेलती है।”

तीन स्तंभों की राह… शिक्षा, जवाबदेही और सशक्तिकरण
मंच से उन्होंने समाधान की दिशा में एक स्पष्ट और ठोस दृष्टि रखी।
पहला स्तंभ — शिक्षा : डिजिटल साक्षरता और ऑनलाइन सुरक्षा को स्कूल, कॉलेज और पंचायत स्तर तक ले जाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जब तक लोग समझेंगे नहीं, वे सुरक्षित नहीं रहेंगे।
दूसरा स्तंभ — जवाबदेही : मंत्री ने कहा कि कानूनों को सशक्त बनाना और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को जवाबदेह ठहराना ज़रूरी है। “पुलिस, साइबर सेल और टेक प्लेटफॉर्म में लिंग-संवेदनशीलता को बढ़ाना अब समय की मांग है।”
तीसरा स्तंभ — सशक्तिकरण : उन्होंने “CTRL+SHIFT+RESPECT” जैसे सामुदायिक अभियानों का ज़िक्र किया, जिनका उद्देश्य महिलाओं को डिजिटल दुनिया में आत्मविश्वास देना है। उन्होंने कहा, “सुरक्षा तभी संभव है जब समाज महिलाओं को बराबर का हिस्सा माने।” मंत्री ने मुस्कुराते हुए कहा… “यह सिर्फ़ महिलाओं की लड़ाई नहीं है, यह समाज की ज़िम्मेदारी है।”
वैश्विक सहयोग और भारत की भूमिका
दीपिका ने बताया कि भारत UNFPA, IPU और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर डिजिटल हिंसा के खिलाफ रणनीति बना रहा है। उन्होंने “16 Days of Activism” जैसे अभियानों का उदाहरण देते हुए कहा कि “दुनिया अब सिर्फ़ नारीवाद नहीं, डिजिटल समानता की नई परिभाषा लिख रही है।”
नीति से नारी तक… संसद की भूमिका पर जोर
उन्होंने संसद और नीति निर्माताओं को संबोधित करते हुए कहा… “महिला सांसदों और कार्यकर्ताओं पर ऑनलाइन हमला लोकतंत्र पर हमला है।” दीपिका ने यह भी कहा कि नारी केंद्रित डिजिटल कानून बनाना और सोशल मीडिया कंपनियों को जवाबदेह ठहराना अब वक्त की मांग है। उनकी यह बात पूरे हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट के बीच गूंजी।
जब एक भारतीय महिला की आवाज बनी वैश्विक प्रतीक
कार्यक्रम के अंत में जब दीपिका मंच से उतरीं, तो कई देशों की महिला प्रतिनिधियों ने उनके पास आकर कहा… “आपने वो कहा, जो हम सब महसूस करते हैं।” उनका वक्तव्य लुसर्न की झीलों से निकलकर दुनिया के हर उस कोने तक पहुँचा, जहाँ कोई महिला ऑनलाइन नफरत या डर का सामना कर रही है। मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि ऑनलाइन हिंसा तकनीक की नहीं, मानसिकता की समस्या है। इसे रोकने के लिए हमें डिजिटल शिक्षा, जवाबदेही और संवेदनशील समाज… तीनों की ज़रूरत है।
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