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Ranchi : रांची के बीएनआर चाणक्य होटल में मंगलवार को हॉल में बैठी ज्यादातर महिलाएं अपने अनुभव, डर और उम्मीदें लेकर आई थीं। मंच पर अधिकारी और विशेषज्ञ मौजूद थे, लेकिन माहौल किसी सख्त मीटिंग जैसा नहीं था। माहौल ऐसा था जैसे कोई कह रहा हो कि पहली बार तुम्हारी बात सच में सुनी जा रही है।
एक मंच जहां दर्द और सवाल दोनों सुने गए
जिला विधिक सेवा प्राधिकार और इब्तिदा एनजीओ की ओर से आयोजित इस राज्य स्तरीय परामर्श कार्यशाला में जेंडर आधारित हिंसा और डिजिटल हिंसा पर खुलकर बात हुई। कई महिलाएं पहली बार किसी बड़े मंच पर अपनी बात रख रही थीं। कुछ अपनी पहचान छुपाए हुए थीं, फिर भी बोलने का साहस लेकर आई थीं। उनकी आवाज में कंपन था लेकिन सच था।
“डर से ज्यादा जरूरी है अपनी बात कहना”
कार्यशाला की शुरुआत करते हुए डालसा सचिव रवि कुमार भास्कर ने कहा कि किसी भी पीड़िता का पहला कदम ही सबसे कठिन होता है। ज्यादातर महिलाएं शिकायत दर्ज कराने से डरती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी बात सुनी नहीं जाएगी। रवि भास्कर ने बताया कि कानून सिर्फ कागज पर नहीं है, वह उनके साथ खड़ा है। उन्होंने कहा कि डिजिटल दुनिया में बढ़ती हिंसा को समझना और उससे बचना आज हर लड़की और महिला के लिए जरूरी है।

“ऑनलाइन होते हुए भी हम अकेले पड़ जाते हैं”
कार्यशाला में मौजूद कई महिलाएं डिजिटल हिंसा का कड़वा अनुभव लेकर पहुंची थीं। किसी का फर्जी प्रोफाइल बना था, किसी को धमकी मिली थी, किसी की निजी तस्वीरें गलत तरीके से इस्तेमाल की गई थीं। एक प्रतिभागी ने धीमी आवाज में कहा, “ऑनलाइन सबके सामने होने के बावजूद हम सबसे ज्यादा अकेले हो जाते हैं।” उनकी यह लाइन हॉल में बैठे हर व्यक्ति को कुछ देर के लिए खामोश कर गई।
शिक्षा और आत्मविश्वास ही असली सुरक्षा
अधिकारियों ने सुरक्षा के उपाय बताए, लेकिन चर्चा सिर्फ कानून पर नहीं रुकी। कई वक्ताओं ने कहा कि लड़कियों की पढ़ाई ही उन्हें मजबूत बनाती है। रवि भास्कर ने साफ कहा, “जब महिलाएं पढ़ती हैं तो सिर्फ वे ही नहीं, पूरा समाज बदलता है।”
उन्होंने बताया कि जागरूकता बढ़ने से आधे अपराध खुद ही रुक सकते हैं।
महिलाओं की आवाज ने बदली माहौल की दिशा
इस कार्यशाला में मौजूद एनजीओ प्रतिनिधियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और ट्रांसजेंडर समुदाय की महिलाओं ने भी अपनी बात रखी। माहौल ऐसा नहीं था कि कोई ऊपर से निर्देश दे रहा हो। यह एक ऐसा क्षण था जहां हर कोई दूसरे की बात बिना काटे सुन रहा था।
नशरीन ने मंच का संचालन सरल और सहज अंदाज में किया। उन्होंने हर वक्ता को बोलने का पूरा स्थान दिया।
उम्मीद लेकर लौटीं कई महिलाएं
कार्यक्रम खत्म होने तक कई महिलाओं के चेहरे बदल चुके थे। कुछ बोलीं कि उन्हें पहली बार लगा कि वे अकेली नहीं हैं। कुछ ने कहा कि अब वे अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहती हैं। शाम ढलते-ढलते यह साफ महसूस हुआ कि यह सिर्फ एक कार्यशाला नहीं थी। यह उन महिलाओं के लिए एक मौका था जो हर दिन अपने डर और संघर्ष के बीच भी खुद को संभाले रहती हैं। आज उन्हें लगा कि कोई है जो उनके साथ खड़ा है।
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