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Garhwa : गढ़वा थाना में आम दिनों की हलचल के बीच जब राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) और JHALSA की ओर से विधिक जागरूकता शिविर लगा, तो माहौल में एक तरह की उम्मीद दिखी। यह कार्यक्रम सिर्फ एक सरकारी पहल नहीं था, बल्कि उन लोगों के लिए एक रोशनी थी, जो अक्सर न्याय तक पहुंचने की प्रक्रिया में खुद को अकेला और लाचार महसूस करते हैं। इस शिविर का आयोजन प्रधान जिला और सत्र न्यायाधीश मनोज प्रसाद तथा DLSA सचिव निभा रंजना लकड़ा के निर्देश पर हुआ था। मंच पर मौजूद थे LADC यानी लीगल एड डिफेंस काउंसिल नित्यानंद दुबे। उनकी आवाज में वह अपनत्व था, जो किसी भी आम व्यक्ति को यह भरोसा दिलाने के लिए काफी होता है कि कानून सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी में भी मौजूद है।
“न्याय सिर्फ अमीरों का अधिकार नहीं”
गांव से आए कई लोग शांत होकर LADC नित्यानंद दुबे की बात सुन रहे थे। वह संविधान के अनुच्छेद 39 ए को आसान भाषा में समझा रहे थे। उन्होंने कहा, “कानून यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी व्यक्ति पैसे की कमी के कारण न्याय से दूर नहीं रहेगा।” लोगों के चेहरों पर एक हल्की उम्मीद झलकने लगी। कई ऐसे थे जिन्होंने कभी कोर्ट का दरवाजा नहीं देखा था, क्योंकि उन्हें लगता था कि वकील और केस उनके बस की बात नहीं।
कौन पा सकता है मुफ्त कानूनी सहायता? जवाब सुनते ही कई आंखों में चमक लौट आई
जब LADC दुबे ने बताया कि महिलाएं, बच्चे, आदिवासी, दलित, मजदूर और वे लोग जिनकी आय कम है, सभी मुफ्त कानूनी सहायता के पात्र हैं, तो कई चेहरों पर हैरानी भी दिखाई दी। कई लोगों को पहली बार पता चला कि अदालत की प्रक्रिया का खर्च, वकील की फीस और कोर्ट शुल्क तक उनसे नहीं लिया जाएगा। मानो किसी ने उनके वर्षों पुराने डर को धागे की तरह खोल दिया हो।
थाना हाजत में कैदियों से मुलाकात, जहां उम्मीद सबसे ज्यादा जरूरी होती है
शिविर के बाद नित्यानंद दुबे थाना हाजत पहुंचे। भीतर तीन कैदी थे। उनकी आंखों में घबराहट और अनिश्चितता साफ दिख रही थी।
दुबे ने साधारण शब्दों में उन्हें उनके कानूनी अधिकार समझाए। कैदियों में से एक ने हौले से पूछा- “क्या हमें भी वकील मिलेगा?” दुबे ने मुस्करा कर कहा, “जरूर मिलेगा। यह आपका अधिकार है, किसी की दया नहीं।” वह जुमला सुनकर उस कैदी की आंखों में एक अलग तरह की चमक आ गई।
छोटे प्रयास, बड़े बदलाव
इस कार्यक्रम में पीएलवी अजीत उरांव की मेहनत दिखाई दी। वह सुबह से लोगों को शिविर की जरूरत समझाते हुए जोड़ रहे थे।
थाने के एसआई आदित्य नायक और पुलिसकर्मियों की मौजूदगी से लोगों को सुरक्षा का एहसास भी मिला। यह आयोजन सिर्फ एक शिविर नहीं था, बल्कि एक ऐसा पुल था जिसने कानून और आम आदमी के बीच की दूरी कुछ कम कर दी।
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