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Pakur (Jaydev Kumar) : पाकुड़ के मुख्यमंत्री उत्कृष्ट विद्यालय राज प्लस टू का परिसर शनिवार को कुछ अलग ही दृश्य का साक्षी बना। जिन कक्षाओं में कभी शोरगुल के बीच पढ़ाई हुआ करती थी, उन्हीं गलियारों में वर्षों बाद पुरानी यादों की आहट सुनाई दी। सफेद बाल, झुकी चाल और चमकती आंखों के साथ जब 1962 से 2000 बैच के पूर्व छात्र विद्यालय लौटे, तो यह सिर्फ एक आयोजन नहीं बल्कि भावनाओं का संगम बन गया।
166वें स्थापना दिवस ने जोड़ दी पीढ़ियां
विद्यालय के 166वें स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित यह समारोह इसलिए खास रहा क्योंकि पहली बार विद्यालय में एल्युमिनाई मीट का आयोजन हुआ। दशकों पहले यहां से शिक्षा प्राप्त कर चुके छात्र जब फिर उसी आंगन में खड़े थे, जहां कभी भविष्य के सपने बुने गए थे, तो हर चेहरा एक कहानी कह रहा था।
संस्थापक को नमन, परंपरा का सम्मान
कार्यक्रम की शुरुआत उपायुक्त पाकुड़ मनीष कुमार द्वारा विद्यालय के संस्थापक की प्रतिमा पर माल्यार्पण से हुई। इसके बाद प्रभारी प्रधानाध्यापक राजू नंदन साहा ने ध्वजारोहण किया। जैसे ही राष्ट्रध्वज लहराया, पूरा परिसर तालियों की गूंज से भर उठा।

छात्राओं के गीतों में दिखी आत्मा
दीप प्रज्वलन के बाद छात्राओं ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया। गीत के बोलों में विद्यालय के प्रति सम्मान था और सुरों में गर्व। इसके बाद छात्रों ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों, विज्ञान मॉडलों और शैक्षणिक गतिविधियों के माध्यम से यह दिखाया कि सरकारी विद्यालय भी प्रतिभा के केंद्र हो सकते हैं।
सम्मान पाकर नम हुई आंखें
एल्युमिनाई मीट के दौरान जब डीसी मनीष कुमार ने 1962 से 2000 तक के पासआउट छात्रों को मंच पर बुलाकर स्मृति चिन्ह प्रदान किए, तो कई आंखें नम हो गईं। किसी ने अपने शिक्षक को याद किया, तो किसी ने वही पुराना बेंच खोजने की कोशिश की, जिस पर बैठकर उसने सपनों की उड़ान भरी थी।

डीसी बोले- यह सिर्फ कार्यक्रम नहीं, एक भावना है
डीसी मनीष कुमार ने कहा कि यह आयोजन जिले के लिए ऐतिहासिक है। सरकारी विद्यालय में इस तरह का एल्युमिनाई मीट विद्यार्थियों में अपनापन और प्रेरणा पैदा करता है। उन्होंने कहा कि जब पूर्व छात्र लौटकर अपने विद्यालय से जुड़ते हैं, तो वर्तमान छात्रों को यह विश्वास मिलता है कि यहीं से निकलकर वे भी ऊंचाइयों तक पहुंच सकते हैं।
वर्तमान और अतीत का सुंदर संगम
पूर्व छात्रों ने विद्यार्थियों से संवाद किया, अपने अनुभव साझा किए और जीवन की सीख दी। यह पल ऐसा था, जहां अतीत वर्तमान से हाथ मिला रहा था। शिक्षकों और कर्मचारियों को भी सम्मानित किया गया, जिनके प्रयासों से विद्यालय की पहचान बनी। कार्यक्रम की सबसे बड़ी सफलता यही रही कि पूर्व छात्र सुबह से लेकर शाम तक विद्यालय परिसर में डटे रहे। कोई पुराने दोस्तों से मिला, तो कोई अपनी पुरानी कक्षा में जाकर खामोशी से बैठ गया।

एक परंपरा की शुरुआत
166वें स्थापना दिवस पर आयोजित यह एल्युमिनाई मीट सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक परंपरा की नींव बन गया। ऐसा लगा मानो यह विद्यालय सिर्फ ईंट और दीवारों का ढांचा नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाला एक जीवंत परिवार है।

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