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Ranchi : पिठोरिया का अंबेडकर चौक आम दिनों में शांत रहता है, लेकिन 28 दिसंबर की दोपहर यहां कुछ अलग ही दृश्य था। हाथों में तख्तियां, आंखों में चिंता और आवाज़ में गुस्सा लिए लोग सड़कों पर उतर आए थे। मुद्दा सिर्फ एक पहाड़ या जंगल का नहीं था, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का था। यही वजह थी कि आरावली बचाओ–जंगल बचाओ अभियान के तहत यह प्रदर्शन केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक मानवीय पुकार बन गया। धूप तेज थी, लेकिन लोगों के कदम डगमगा नहीं रहे थे। किसी के हाथ में लिखा था “जंगल बचेगा तभी जीवन बचेगा”, तो कोई कह रहा था “हमारे बच्चों को धूल नहीं, हवा चाहिए।” भीड़ में बुजुर्ग भी थे, युवा भी और मजदूर तबके के लोग भी, जिनकी रोजी-रोटी सीधे प्रकृति से जुड़ी है।
जंगल सिर्फ पेड़ नहीं, जीवन की ढाल हैं
भाकपा–माले कांके प्रखंड कमेटी के नेता कॉमरेड जफर अंसारी ने जब माइक संभाला, तो आवाज में गुस्सा नहीं, बल्कि चिंता साफ झलक रही थी। उन्होंने कहा कि आरावली सिर्फ पहाड़ नहीं, बल्कि जीवन की ढाल है। यही पहाड़ पानी रोकते हैं, हवा को शुद्ध रखते हैं और आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य देते हैं। उन्होंने कहा कि जब पहाड़ कटते हैं तो सिर्फ जमीन नहीं टूटती, इंसान का भविष्य भी दरकता है। कॉरपोरेट मुनाफे के लिए हो रहा यह विनाश आम लोगों की जिंदगी पर सीधा हमला है।
हरियाली के जगह अब सिर्फ उड़ती है धूल
भीड़ में खड़े सरफराज अंसारी बताते हैं कि उनके गांव के आसपास पहले हरियाली थी, अब सिर्फ धूल उड़ती है। आकाश रंजन कहते हैं कि अगर अब भी आवाज नहीं उठाई गई तो बच्चों को साफ पानी और हवा भी नसीब नहीं होगी। महिलाएं और बुजुर्ग भी चिंता जताते दिखे कि जंगल कटने से मौसम बदल रहा है और खेती पर असर पड़ रहा है।
सरकार से की गई सख्त मांग
नारे लगते रहे… “आरावली बचाओ, जीवन बचाओ”, “जंगल बचाओ, देश बचाओ”। ये सिर्फ नारे नहीं थे, बल्कि एक चेतावनी थी कि अगर प्रकृति से खिलवाड़ जारी रहा तो इसका खामियाजा हर इंसान को भुगतना पड़ेगा।
प्रदर्शन के अंत में कार्यकर्ताओं ने साफ कहा कि यह लड़ाई यहीं खत्म नहीं होगी। अगर सरकार ने खनन और जंगलों की कटाई पर रोक नहीं लगाई, तो यह आंदोलन और व्यापक रूप लेगा। पिठोरिया की इस आवाज में अब सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि पूरे देश की चिंता झलक रही है।
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