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Godda : सुबह का वक्त है। झारखंड के गोड्डा में अदाणी पावर प्रोजेक्ट के पास बने ट्रेनिंग सेंटर में कुछ युवा हेलमेट पहनकर तैयार खड़े हैं। किसी के चेहरे पर डर है, किसी की आंखों में उम्मीद। थोड़ी देर बाद इन्हें 40 से 50 मीटर ऊंचे ट्रांसमिशन टावर पर चढ़ना है। यह सिर्फ एक ट्रेनिंग नहीं, बल्कि उनके लिए नई जिंदगी की शुरुआत है। ये युवा लाइट इंडिया प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं। एक ऐसा प्रोजेक्ट, जो सिर्फ बिजली के टावर नहीं खड़े कर रहा, बल्कि हजारों परिवारों के घरों में भरोसे और स्थिर कमाई की रोशनी भी पहुंचा रहा है।
गांव से निकलकर देशभर तक का सफर
पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड के कई गांवों में आज भी रोजगार के सीमित साधन हैं। खेती से सालभर गुजारा मुश्किल होता है। ऐसे में गांव के युवा अक्सर दूसरे राज्यों में मजदूरी करने निकल जाते हैं। टावर निर्माण का काम भी ऐसा ही एक रास्ता रहा है, जिसे लोग परंपरा से सीखते आए हैं। अक्सर देखा गया है कि एक ही गांव या परिवार के लोग मिलकर एक गैंग बनाते हैं। पिता के साथ बेटा, चाचा के साथ भतीजा। काम कठिन है, लेकिन भरोसे का होता है। ऊंचाई पर खड़े होकर काम करने के लिए मशीन से ज्यादा इंसान पर भरोसा करना पड़ता है।
ऊंचाई का डर और जिम्मेदारी का बोझ
टावर निर्माण आसान काम नहीं है। 40 से 70 मीटर की ऊंचाई, नीचे खेत, जंगल या नदी। हल्की सी चूक जानलेवा हो सकती है। इसके बावजूद हजारों लोग यह जोखिम उठाते हैं, क्योंकि यही काम उनके परिवार की रोजी-रोटी है। अब तक यह काम सीखने का कोई तय सिस्टम नहीं था। नए लोग सीनियर के साथ काम करते हुए धीरे-धीरे सब समझते थे। इसी वजह से कुशल मैनपावर की भारी कमी बनी रही। देश में बिजली ट्रांसमिशन के प्रोजेक्ट बढ़ते गए, लेकिन काम करने वाले लोग उतनी तेजी से नहीं बढ़ पाए।
ट्रेनिंग से बदली तस्वीर
लाइट इंडिया प्रोजेक्ट ने इसी कमी को पहचान कर एक नई राह खोली। गोड्डा में शुरू हुए इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में युवाओं को तीन महीने तक पूरी तैयारी कराई जाती है। रहने और खाने का खर्च कंपनी उठाती है। इसके साथ हर महीने 21,000 रुपये का वजीफा भी मिलता है। यहां युवा सिर्फ किताबों से नहीं, बल्कि असली टावर पर चढ़कर सीखते हैं। टावर को जोड़ना, खोलना, सेफ्टी नियमों का पालन करना और ऊंचाई पर संतुलन बनाए रखना। ट्रेनिंग के दौरान डर धीरे-धीरे आत्मविश्वास में बदल जाता है।
कमाई के साथ सम्मान भी
ट्रेनिंग पूरी करने के बाद ये युवा 30 से 35 हजार रुपये महीने की कमाई कर सकते हैं। लेकिन इनके लिए यह सिर्फ पैसा नहीं है। यह सम्मान है, पहचान है और अपने परिवार को बेहतर भविष्य देने का मौका है। पहले बैच के 70 युवक अब देश के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रहे हैं। कोई पहली बार पक्की कमाई से घर बना रहा है, तो कोई बच्चों की पढ़ाई का सपना देख रहा है।
रोशनी सिर्फ घरों में नहीं, जिंदगी में भी
अदाणी समूह का लक्ष्य हर साल करीब 1,000 युवाओं को इस ट्रेनिंग से जोड़ने का है। इससे न सिर्फ बिजली परियोजनाओं को गति मिलेगी, बल्कि उन गांवों में भी उम्मीद जगेगी, जहां रोजगार की तलाश आज भी सबसे बड़ी चुनौती है।
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