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Home » 30 साल का आतंक, 154 मुकदमे और 20 लाख का इनाम… जांबाजों ने ऐसे ढहाया खूंखार रवींद्र गंझू का ‘किला’
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30 साल का आतंक, 154 मुकदमे और 20 लाख का इनाम… जांबाजों ने ऐसे ढहाया खूंखार रवींद्र गंझू का ‘किला’

July 14, 2026No Comments6 Mins Read
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Latehar : इसे कहते हैं कानून के हाथ, जो देर से ही सही लेकिन जब मुकम्मल पड़ते हैं तो बड़े से बड़े शातिर का गुरूर मिट्टी में मिल जाता है। झारखंड पुलिस और NIA की हिट लिस्ट में सबसे ऊपर चल रहा 20 लाख का इनामी माओवादी रीजनल कमांडर और सैनिक चीफ रवींद्र गंझू उर्फ मुकेश उर्फ सुरेंद्र आखिरकार सलाखों के पीछे पहुंच चुका है। झारखंड सरकार ने इसके सिर पर 15 लाख और एनआईए ने 5 लाख का इनाम रखा था।

12 जुलाई 2026 की रात लातेहार के पुलिस कप्तान कुमार गौरव को एक बेहद सटीक खुफिया इनपुट मिला था। इनपुट यह था कि अपनी ताकत खो चुका रवींद्र गंझू चंदवा और बेतर ओपी इलाके के हेसला बांझी टोला, रंगुनिया और कुडू के जंगलों में अपने कुछ बचे-खुचे साथियों के साथ छिपा हुआ है। वह अपने पैतृक घर के आस-पास ही मंडरा रहा था।

बिना एक पल गंवाए लातेहार पुलिस, CRPF और कोबरा 209 बटालियन के जांबाज हरकत में आए। रात के घने अंधेरे में सुरक्षा बलों ने बांझी टोला गांव के बाहरी इलाके और जंगल को चारों तरफ से घेर लिया। भोर होते ही जैसे ही घेरा छोटा हुआ, खुद को घिरा देख भागने की कोशिश कर रहा 43 वर्षीय रवींद्र गंझू सुरक्षा बलों के हत्थे चढ़ गया। 30 साल से चल रही लुका-छिपी का अंत महज कुछ मिनटों में हो गया।

एके-56 और ऑटोमैटिक पिस्टल बरामद

रवींद्र गंझू की गिरफ्तारी के बाद जब कोबरा कमांडोज ने जंगल के उस ठिकाने को खंगाला, तो वहां हथियारों की एक छोटी-मोटी दुकान सजी मिली। पुलिस ने मौके से जो सामान जब्त किया, वह उसकी खतरनाक प्रोफाइल को बयां करने के लिए काफी था:

  • एक बेहद घातक ऑटोमैटिक एके-56 (AK-56) राइफल, 2 मैगजीन और 180 राउंड जिंदा कारतूस।
  • एक 7.65 एमएम की ऑटोमैटिक पिस्टल, 2 मैगजीन और 12 राउंड जिंदा कारतूस।
  • एक देशी सिंगल बैरल राइफल।
  • 5.56 एमएम के 21 और .303 के 16 जिंदा कारतूस।
  • इन हथियारों और गोलियों को कैरी करने के लिए इस्तेमाल होने वाला एक काले रंग का पाउच।

पुलिस की वायरलेस बातचीत सुन बदल लेता था ठिकाना

सुरक्षा एजेंसियां सालों से रवींद्र गंझू को क्यों नहीं पकड़ पा रही थीं? इसका एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा कुछ समय पहले पकड़े गए एक अन्य जोनल कमांडर रंथू उरांव ने किया था। रवींद्र कोई आम नक्सली नहीं था, वह तकनीकी रूप से बेहद शातिर था।

आमतौर पर नक्सली मोटोरोला के वायरलेस सेट का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन रवींद्र गंझू ने अपने पास सोनी कंपनी का एक आधुनिक ‘रेडियो इंटरसेप्टर’ रख रखा था। इस हाईटेक डिवाइस की मदद से वह घने जंगलों में बैठकर आराम से झारखंड पुलिस के वायरलेस फ्रीक्वेंसी को हैक कर लेता था और उनकी गुप्त बातें सुन लेता था। पुलिस कब, किस रास्ते से और किस गाड़ी से ऑपरेशन के लिए निकल रही है, यह जानकारी उसे पहले ही मिल जाती थी और पुलिस के पहुंचने से पहले ही वह अपना ठिकाना बदल लेता था।

अमित शाह की रैली और वो खूनी वारदात जिसने सबको दहला दिया

रवींद्र गंझू की क्रूरता का सबसे खौफनाक चेहरा 22 नवंबर 2019 को सामने आया था। देश के गृह मंत्री अमित शाह एक चुनावी जनसभा के लिए चंदवा आने वाले थे। पूरी घाटी पुलिस छावनी में तब्दील थी। इसी वीआईपी मूवमेंट के बीच रवींद्र गंझू के निर्देश पर उसके शूटरों ने लुकैया मोड़ के पास पुलिस की पीसीआर वैन पर घात लगाकर अंधाधुंध फायरिंग कर दी।

इस कायराना हमले में एएसआई शुकरा उरांव सहित चार पुलिसकर्मी मौके पर ही शहीद हो गए थे। नक्सली उनके सरकारी हथियार और गोलियां भी लूटकर ले गए थे। एनआईए की जांच में सामने आया कि इस खूनी खेल को कामयाब बनाने के बाद रवींद्र गंझू ने बोदा तालाब के पास अपने ओवरग्राउंड वर्कर सुनील गंझू, फगुना गंझू और बैजनाथ गंझू की पीठ थपथपाई थी और उन्हें पांच-पांच हजार रुपये का नकद इनाम भी बांटा था।

154 मुकदमें और 30 साल का काला साम्राज्य

महज 13-14 साल की उम्र में माओवादी संगठन का दामन थामने वाला रवींद्र गंझू धीरे-धीरे संगठन में बढ़ता हुआ सैनिक चीफ बन बैठा। उसके खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण, रंगदारी, आईईडी ब्लास्ट, लेवी वसूली और सरकारी संपत्तियों को उड़ाने जैसे कुल 154 संगीन मामले दर्ज हैं। इलाके में होने वाले सड़क और पुल निर्माण के विकास कार्यों को रोकना उसका मुख्य पेशा था। ठेकेदारों से करोड़ों की लेवी वसूलना और मना करने पर जेसीबी मशीनों को फूंक देना या मुंशी की हत्या कर देना उसके बाएं हाथ का खेल था। साल 2024 में भी उसने एक सड़क निर्माण साइट पर जेसीबी चालक पर जानलेवा हमला करवाया था।

‘ऑपरेशन बुलबुल’ ने तोड़ी थी कमर, कोर्ट ने घोषित किया था भगोड़ा

साल 2022 में सुरक्षा बलों द्वारा चलाया गया ‘ऑपरेशन बुलबुल’ रवींद्र गंझू के खात्मे की पटकथा का पहला अध्याय था। कोबरा बटालियन और पुलिस ने बूढ़ा पहाड़ और बुलबुल-पेशरार के जंगलों में 18 दिनों तक महा-अभियान चलाया था। इस ऑपरेशन में उसके दस्ते के 36 से ज्यादा हथियारबंद लड़ाके या तो मारे गए या पकड़े गए। उसका पूरा कुनबा बिखर गया और वह अकेला पड़ गया था।

इसी साल मई में रांची की एनआईए विशेष अदालत ने उसे भगोड़ा घोषित करते हुए 30 दिनों का अल्टीमेटम दिया था कि अगर वह हाजिर नहीं हुआ तो उसकी गैर-मौजूदगी में ही सजा मुकर्रर कर दी जाएगी। कोर्ट की मियाद खत्म होने के बाद आखिरकार वह पुलिस के शिकंजे में आ ही गया।

पुलिस की वायरलेस फ्रीक्वेंसी हैक करने वाला खूंखार नक्सली रविंद्र गंझू AK-56 और पिस्टल के साथ धराया। अमित शाह की रैली के दिन 4 पुलिसकर्मियों की हत्या का था मास्टरमाइंड। लातेहार SP कुमार गौरव क्या बोले… देखें#Jharkhand #Latehar #Naxalite #BreakingNews #Trending #NewsSamvad pic.twitter.com/D7d5xqryPN

— News Samvad (@newssamvaad) July 14, 2026

शिकार करने वाली जांबाज टीम

इस बड़े ऑपरेशन को अंजाम देने वालों में कोबरा 209 बटालियन के उप कमांडेंट दीपक कुमार, बेतर ओपी प्रभारी रितेश कुमार राय, सब-इंस्पेक्टर रितेश तिग्गा, सैट-45 के प्रभारी मजलु कालिन्दी, आरक्षी राहुल कुमार दुबे और पीयूष पन्ना समेत कोबरा और सैट के जांबाज जवान शामिल थे, जिन्होंने महीनों की रेकी के बाद इस बड़े नक्सली कमांडर के साम्राज्य का अंत कर दिया।

इसे भी पढ़ें : दफ्तर के तनाव को मात देने उतरी ‘दिमाग और उंगलियों की जंग’, CCL में सजा खेलों का मेला

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