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Home » शिबू सोरेन : ‘जल, जंगल, जमीन’ का वो सिपाही, जिसने भारत के नक्शे पर उकेरा एक नया राज्य
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शिबू सोरेन : ‘जल, जंगल, जमीन’ का वो सिपाही, जिसने भारत के नक्शे पर उकेरा एक नया राज्य

August 4, 2026No Comments10 Mins Read
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शिबू सोरेन
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Pawan Thakur, Ranchi

झारखंड की फिजाओं में तैरती हर वो आवाज, जो अपने जल, जंगल और जमीन की हिफाजत के लिए उठती है… वह आज भी एक ही नाम पुकारती है… ‘दिशोम गुरु’। सूदखोरों के जुल्म से कराहते बेबस आदिवासियों के हाथ में जब पहली बार अपने हक की फसल काटने के लिए हंसुआ और सम्मान के लिए तीर-धनुष आया, तो उस क्रांति के पीछे एक ही चेहरा था… शिबू सोरेन। पिता की निर्मम हत्या की आग में तपकर क्रंदन से कंचन बने शिबू सोरेन ने जंगलों में फरारी काटी, भूखे पेट मीलों पदयात्राएं की, लेकिन जुल्म के आगे कभी सिर नहीं झुकाया। दुमका के पहाड़ों से लेकर दिल्ली की संसद और फिर झारखंड के मुख्यमंत्री के सिंहासन तक का उनका यह सफर ऐतिहासिक है। यह जीवन गाथा है उस शख्सियत की, जिसने शोषितों की आह को अपनी ढाल बनाया और भारत के नक्शे पर ‘झारखंड’ नाम के एक नये सपने को सच कर दिखाया।

नेमरा का वह लड़का और महाजनी जुल्म की काली छाया

यह कहानी शुरू होती है अविभाजित बिहार (अब झारखंड) के रामगढ़ जिले में स्थित एक बेहद छोटे और पिछड़े गांव नेमरा से। 11 जनवरी 1944 को इसी गांव में सोबरन सोरेन और सोनामुनी देवी के घर एक बच्चे का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया शिबू सोरेन। गांव के आम बच्चों की तरह शिबू का बचपन भी जंगलों के बीच, सादगी और तंगहाली में बीत रहा था। उस दौर में छोटानागपुर और संताल परगना के इलाकों में महाजनी और सूदखोरी प्रथा का ऐसा भयानक मकड़जाल फैला हुआ था कि गरीब आदिवासी उसमें एक बार फंसता तो जिंदगी भर निकल नहीं पाता था। थोड़े से पैसों या अनाज के बदले महाजन आदिवासियों की उपजाऊ जमीनें हड़प लेते थे और उनकी ब्याज दरें इतनी ऊंची होती थी कि पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी कर्ज चुकता नहीं होता था।

शिबू सोरेन के पिता सोबरन सोरेन एक साधारण किसान होने के साथ-साथ गांव के बच्चों को पढ़ाते भी थे। वे एक जागरूक इंसान थे और उनसे आदिवासियों पर हो रहा यह अत्याचार देखा नहीं जाता था। सोबरन सोरेन ने गांव-गांव जाकर लोगों को समझाना शुरू किया कि वे महाजनों के आगे न झुकें, अपनी जमीनों को न छोड़ें और अपने बच्चों को पढ़ाएं। लेकिन यह बात स्थानीय महाजनों और सूदखोरों को रास नहीं आई और उन्होंने सोबरन सोरेन की निर्मम हत्या कर दी। जब पिता का शव घर आया, तब शिबू सोरेन की उम्र बहुत कम थी। एक तरफ पिता को खोने का पहाड़ जैसा दु:ख था, तो दूसरी तरफ आंखों के सामने जलती हुई अन्याय की आग। उस मासूम उम्र में शिबू सोरेन ने अन्याय के खिलाफ छाती तानकर खड़े होने का रास्ता चुना, जो आगे चलकर एक बड़े आंदोलन का रूप ले लिया।

महाजनों के खिलाफ ‘धान काटो आंदोलन’ और ‘दिशोम गुरु’ का उदय

पिता के जाने के बाद शिबू सोरेन ने पढ़ाई-लिखाई के बजाय गांव के लोगों को जोड़ना अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया। साठ के दशक के उत्तरार्ध में उन्होंने ‘संथाल नवयुवक सभा’ का गठन किया। शिबू सोरेन अच्छी तरह जानते थे कि लड़ाई सिर्फ बाहर के दुश्मनों से नहीं, बल्कि समाज के अंदर की बुराइयों से भी है। इसलिए उन्होंने आदिवासियों के बीच जाकर शराबबंदी, शिक्षा के प्रसार और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। इसके बाद शुरू हुआ इतिहास का वह दौर जिसे ‘धान काटो आंदोलन’ के नाम से जाना जाता है। महाजनों ने छल-कपट से आदिवासियों की जिन जमीनों पर कब्जे कर लिए थे, शिबू सोरेन अपने समर्थकों के साथ उन खेतों में पहुंच जाते थे। सैकड़ों-हजारों की संख्या में आदिवासी ढोल-नगाड़ों के साथ खेतों में उतरते और अपनी उगाई हुई फसल को काटकर ले आते थे। आदिवासियों के प्रति इसी निडर नेतृत्व और समर्पण को देखकर लोगों ने उन्हें आदर से ‘दिशोम गुरु’ यानी देश का गुरु कहना शुरू कर दिया।

जंगलों में फरारी और जनता के बीच बनती साख

सत्तर के दशक में शिबू सोरेन का प्रभाव इतना बढ़ गया कि तत्कालीन सरकार और पुलिस के लिए वे एक बड़ी चुनौती बन गए। उन पर कई मामले दर्ज हुए और उन्हें गिरफ्तार करने के लिए पुलिस ने दिन-रात एक कर दिया। लेकिन शिबू सोरेन महीनों तक जंगलों और पहाड़ियों में छिपे रहते थे। जंगल में रहने का मतलब यह नहीं था कि वे आंदोलन से कट गए थे, बल्कि रात के अंधेरे में वे किसी गांव में पहुंचते और आदिवासियों की चौपाल लगाकर लोगों को संगठित होने का पाठ पढ़ाते थे। पुलिस जहां उन्हें भगोड़ा मान रही थी, वहीं गांव-गांव में उनके नाम की कसमें खाई जा रही थीं। शिबू सोरेन ने कभी कोई आलीशान जिंदगी नहीं जी, वे वही खाते और पहनते थे जो गांव का आम आदमी इस्तेमाल करता था। इसी सादगी और जमीनी जुड़ाव ने उन्हें जनता के दिल में हमेशा के लिए बसा दिया।

4 फरवरी 1973… जब धनबाद में इतिहास रचा गया

जैसे-जैसे महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन मजबूत हुआ, शिबू सोरेन और उनके साथियों को समझ आने लगा कि जब तक आदिवासियों का अपना अलग राज्य नहीं होगा, तब तक उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता। अलग राज्य के विचार को एक मजबूत राजनीतिक मंच देने के लिए तीन बड़े दिग्गज एक साथ आए। प्रसिद्ध वामपंथी नेता एके रॉय, प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता विनोद बिहारी महतो और खुद शिबू सोरेन ने मिलकर चार फरवरी 1973 को धनबाद के गोल्फ ग्राउंड से JMM यानी झारखंड मुक्ति मोर्चा की नींव रखी। विनोद बिहारी महतो को पार्टी का पहला अध्यक्ष बनाया गया और शिबू सोरेन को महासचिव की कमान सौंपी गई। इसके बाद जेएमएम केवल एक राजनीतिक दल नहीं रहा, बल्कि अलग राज्य की मांग और आदिवासियों के आत्मसम्मान की मुख्य धारा बन गया।

पदयात्राएं, तीर-धनुष और दिल्ली के गलियारों में गूंज

झारखंड मुक्ति मोर्चा के झंडे तले शिबू सोरेन ने पूरे छोटानागपुर और संताल परगना का दौरा किया। वे कड़कड़ाती धूप और घनघोर बारिश में भी मीलों पैदल चलते थे। आदिवासी अपने पारंपरिक हथियार तीर और धनुष लेकर उनकी सभाओं में पहुंचते थे, जो उनके स्वाभिमान का प्रतीक बन गया था। दिल्ली के बड़े-बड़े नेताओं को जब पता चला कि जंगलों में एक ऐसा नेता खड़ा हो गया है जिसके एक इशारे पर लाखों लोग सड़कों पर उतर आते हैं, तो वे भी चौकन्ने हो गए। 1980 में शिबू सोरेन पहली बार दुमका लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। इसके बाद दुमका शिबू सोरेन का ऐसा मजबूत गढ़ बना कि वे वहां से आठ बार सांसद चुने गए और संसद में आदिवासियों की आवाज बुलंद करते रहे।

लंबे संघर्ष के बाद मुकाम… 15 नवंबर 2000 और अलग झारखंड का सपना

अस्सी और नब्बे के दशक में अलग राज्य का आंदोलन अपने चरम पर पहुंच गया। आर्थिक नाकेबंदी की गई, विशाल रैलियां हुईं और गिरफ्तारियां दी गईं। शिबू सोरेन ने संसद से लेकर सड़क तक एक ही बात दोहराई कि झारखंड के खनिज से पूरा देश रोशन हो रहा है, लेकिन झारखंड का आदिवासी अंधेरे में जीने को मजबूर है। आखिरकार, दशकों की लंबी लड़ाई और अनगिनत कुर्बानियों के बाद केंद्र सरकार को झुकना पड़ा। 15 नवंबर 2000 को भगवान बिरसा मुंडा की जयंती के दिन देश के नक्शे पर 28वें राज्य के रूप में अलग ‘झारखंड’ का जन्म हुआ, जो शिबू सोरेन के जीवन संघर्ष की सबसे बड़ी जीत साबित हुई।

राजनीति के उतार-चढ़ाव और तीन बार मुख्यमंत्री का सफर

अलग राज्य बनने के बाद शिबू सोरेन झारखंड की राजनीति के केंद्र बिंदु बन गए। वे राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री बने, जहां मार्च 2005 में वे पहली बार 10 दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने, फिर अगस्त 2008 से जनवरी 2009 तक दूसरी बार और दिसंबर 2009 से मई 2010 तक तीसरी बार उन्होंने राज्य की कमान संभाली। इसके अलावा, केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार में वे तीन बार केंद्रीय कोयला मंत्री भी रहे। हालांकि, उनका राजनीतिक जीवन कई तरह के विवादों और कानूनी अड़चनों से भी भरा रहा, लेकिन इन सब उतार-चढ़ाव और राजनीतिक साजिशों के बावजूद जनता के बीच उनका कद और लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई।

युग का अंत : जब माटी का लाल सदा के लिए माटी में विलीन हो गया

झारखंड आंदोलन के महानायक और आदिवासियों की मुखर आवाज दिशोम गुरु शिबू सोरेन का चार अगस्त 2025 को 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया था। उनके चले जाने से न केवल झारखंड मुक्ति मोर्चा, बल्कि पूरे देश के जन-आंदोलनों और आदिवासी समाज में एक ऐसा शून्य पैदा हो गया जिसकी भरपाई असंभव है। उनके निधन के बाद पूरे राज्य में गहरा शोक छा गया और झारखंड सरकार ने तीन दिनों के राजकीय शोक की घोषणा की, जिसके कारण उस वर्ष आयोजित होने वाला ऐतिहासिक राज्य स्तरीय आदिवासी महोत्सव भी रद्द कर दिया गया था। दिल्ली से जब उनका पार्थिव शरीर रांची लाया गया, तो अपने प्रिय नेता की अंतिम झलक पाने के लिए सड़कों पर समर्थकों का सैलाब उमड़ पड़ा था। विधानसभा परिसर में उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन और राजकीय सम्मान के लिए रखा गया था। जिसके बाद उनके पैतृक गांव रामगढ़ के नेमरा में पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। दिशोम गुरु आखिरकार उसी माटी की गोद में सदा के लिए विश्राम करने चले गए जिसके हक के लिए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी न्योछावर कर दी थी।

पद्म भूषण और समृद्ध पारिवारिक विरासत

शिबू सोरेन के व्यक्तिगत और सामाजिक योगदान को देश ने भी सराहा। सार्वजनिक जीवन और समाज सेवा में उनके लंबे और ऐतिहासिक योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2026 में मरणोपरांत उन्हें देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया। शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्मभूषण देने का ऐलान गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या यानी 25 जनवरी 2026 को किया गया था। वहीं, 23 जून 2026 को राष्ट्रपति भवन में उन्हें नवाजा गया। उनकी पत्नी रूपी सोरेन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों सम्मान ग्रहण किया। पारिवारिक जीवन में उनकी पत्नी रूपी सोरेन हमेशा उनके संघर्षों में साथ खड़ी रहीं।

शिबू सोरेन की राजनीतिक विरासत को उनके बेटों ने आगे बढ़ाया, जिनमें उनके बड़े बेटे दिवंगत दुर्गा सोरेन भी एक प्रखर नेता रहे और उनके दूसरे बेटे हेमंत सोरेन वर्तमान में झारखंड के मुख्यमंत्री के रूप में राज्य का नेतृत्व कर रहे हैं, जबकि छोटे बेटे बसंत सोरेन दुमका के विधायक हैं। उनकी बड़ी बहू सीता सोरेन भाजपा से जामा की विधायक हैं। वहीं, छोटी बहू यानी सीएम हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन गांडेय की विधायक हैं।

जनमानस के हृदय में अमर दिशोम गुरु

शिबू सोरेन सिर्फ एक नाम या किसी राजनीतिक दल के नेता भर नहीं हैं, वे झारखंड की चेतना और पहचान हैं। पिता की हत्या से शुरू हुआ एक अकेले लड़के का गुस्सा कैसे पूरे समाज की ताकत बन गया, इसकी मिसाल शिबू सोरेन हैं। उन्होंने आदिवासियों को सिर्फ लड़ना नहीं सिखाया, बल्कि उन्हें अपनी पहचान और माटी पर गर्व करना सिखाया। आज भी जब झारखंड के किसी दूर-दराज गांव में अपनी जमीन और संस्कृति बचाने के लिए आवाज उठती है, तो उसमें दिशोम गुरु शिबू सोरेन के संघर्ष की झलक साफ दिखाई देती है।

इसे भी पढ़ें : दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत ‘पद्म भूषण’, राष्ट्रपति ने पत्नी रूपी सोरेन को सौंपा सम्मान

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