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News Samvad : जरा दस साल पीछे मुड़कर अपनी पुरानी जिंदगी को याद कीजिए। साल 2016 के शुरुआती महीने थे। उस दौर में कॉलेज से घर लौटने वाला बेटा बस स्टैंड पर उतरते ही मां को एक मिस्ड कॉल देता था। मतलब साफ़ था, बाबू सुरक्षित पहुंच गया है, चिंता मत करना। घर का राशन लाना हो, दोस्त से मिलना हो या किसी से बात करनी हो, मिस्ड कॉल हमारी आम बातचीत का सबसे किफ़ायती और प्यारा कोडवर्ड बन चुका था।
उस जमाने में मोबाइल पर इंटरनेट चलाना किसी लग्जरी से कम नहीं था। डेटा ऑन करने से पहले लोग सौ बार सोचते थे कि कहीं कोई ऐप बैकग्राउंड में बैलेंस न उड़ा दे। महीने के आखिर में जब डेटा पैक ख़त्म होने की कगार पर आता, तो एक-एक MB को तिजोरी के सिक्के की तरह बचाकर रखा जाता था। वीडियो कॉल का ख्याल तो किसी बड़े सपने जैसा था, क्योंकि 2G और 3G के उस दौर में स्क्रीन पर केवल बफरिंग का पहिया घूमता रहता था और आवाज कट-कट कर आती थी। एक जीबी डेटा के लिए दो सौ से ढाई सौ रुपये चुकाने पड़ते थे, जो किसी भी मध्यमवर्गीय परिवार की जेब पर भारी पड़ते थे।
फिर आया वो ऐतिहासिक दिन, जिसने हर हाथ में दुनिया थमा दी
फिर 5 सितंबर 2016 को रिलायंस जियो की दस्तक हुई। टेलीकॉम दुकानों के बाहर सुबह चार बजे से कतारें लगने लगीं। धूप में पसीने से लथपथ लोग सिर्फ इसलिए लाइन में खड़े थे क्योंकि उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि मुफ्त कॉलिंग और हर दिन 1GB डेटा सचमुच मुमकिन है। कई लोगों को लगा कि यह कुछ दिनों का छलावा है, लेकिन यह छलावा नहीं, बल्कि एक नए भारत के जन्म की सुबह थी।
जियो ने सिर्फ एक सिम कार्ड नहीं बेचा, बल्कि हिंदुस्तान की रग-रग में एक नया आत्मविश्वास फूंक दिया। जो इंटरनेट पहले सिर्फ बड़े शहरों के वातानुकूलित दफ्तरों या अमीर घरों की बपौती समझा जाता था, वह अचानक सुदूर गांव की पगडंडियों पर चलने वाले किसान, ठेले पर फल बेचने वाले भाई और पढ़ाई के लिए संघर्ष करते छात्र के हाथ में आ गया।
इस दस साल के सफर ने हमारे जीने का ढंग बदल दिया। आज जब गांव की दादी सात समंदर पार बैठे अपने पोते को वीडियो कॉल पर मुस्कुराते हुए देखती हैं और हाथ उठाकर आशीर्वाद देती हैं, तो वह सिर्फ एक कॉल नहीं होती, वह अपनों के बीच सिमटी हुई दूरियों का अहसास होता है। वो मां जो कभी बेटे की आवाज़ सुनने के लिए हफ़्तों चिट्ठी या महंगे कॉल के मिनटों का हिसाब रखती थी, अब हर शाम रसोई से ही वीडियो कॉल पर पूछ लेती है कि बेटा, आज खाने में क्या बनाया?
रुपयों के हिसाब से लेकर सपनों की उड़ान तक… बदल गई जमीनी हकीकत
आंकड़ों की भाषा में बात करें तो यह बदलाव किसी अजूबे से कम नहीं लगता। साल 2016 में जिस 1GB डेटा की औसत कीमत करीब 228 रुपये हुआ करती थी, आज वही डेटा गिरकर 8 रुपये से भी नीचे आ चुका है। यानी इंटरनेट करीब 29 गुना सस्ता हो गया। रफ्तार का आलम यह है कि 2.5 Mbps पर हांफने वाला नेटवर्क आज 68 Mbps से भी तेज दौड़ रहा है।
लेकिन इन आंकड़ों के पीछे धड़कती हुई इंसानी ज़िंदगी की कहानियां और भी खूबसूरत हैं। आज किसी छोटे कस्बे की एक लड़की को सिविल सेवा या मेडिकल की तैयारी के लिए बड़े शहर के महंगे हॉस्टल में जाने की मजबूरी नहीं रही। वह अपने घर के कोने में बैठकर देश के बेहतरीन शिक्षकों के वीडियो लेक्चर देखती है और अपने सपने पूरे करती है। एक छोटा सा दुकानदार, जिसके पास कभी स्वाइप मशीन रखने की हैसियत नहीं थी, आज उसकी दुकान के बाहर क्यूआर कोड टंगा है। वह एक रुपये की माचिस की डिब्बी का भुगतान भी डिजिटल तरीके से मुस्कुराते हुए स्वीकार करता है।
घर-घर में टिफिन पहुंचाने वाली महिलाएं, गांव में हस्तशिल्प बनाने वाले कारीगर और खेतों में नई तकनीक सीखने वाले किसान, सबने इस सस्ते और तेज इंटरनेट को अपनी तरक्की का जरिया बना लिया है। यूट्यूब पर वीडियो देखकर नई डिश बनाने वाली गृहणी हो या ऑनलाइन अपनी कला बेचकर आत्मनिर्भर बनने वाला कोई हुनरमंद, जियो की इस क्रांति ने हर किसी को एक मंच दिया है।
5G का नया दौर और बेफिक्र उड़ता डिजिटल भारत
आज देश में मोबाइल इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या 100 करोड़ के पार पहुंच चुकी है। ट्राई और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के आंकड़े बताते हैं कि आज एक आम भारतीय हर महीने औसतन 26GB से ज्यादा डेटा खर्च कर रहा है, जबकि जियो के नेटवर्क पर यह आंकड़ा 43GB के भी पार चला गया है।
अब बात सिर्फ 4G तक सीमित नहीं रही, 5G की तूफानी रफ्तार ने तो बफरिंग जैसे शब्द को ही पुरानी यादों में दफन कर दिया है। करोड़ों लोग आज 5G नेटवर्क पर पढ़ाई, दफ्तर का काम, गेमिंग और मनोरंजन का लुत्फ उठा रहे हैं। चीन को अगर किनारे रख दें, तो आज दुनिया में सबसे ज्यादा डेटा ट्रैफिक संभालने का गौरव भारत की इस डिजिटल लाइफलाइन के पास है।
मिस्ड कॉल के उस तंगहाली भरे दौर से निकलकर आज के इस समृद्ध डिजिटल युग तक का यह सफर केवल एक कंपनी की व्यावसायिक कामयाबी भर नहीं है। यह उन करोड़ों हिंदुस्तानियों के सपनों, जज्बातों और उनकी उम्मीदों की जीत है, जिन्हें पहली बार लगा कि दुनिया उनके कदमों में है। जियो के इन दस सालों ने सचमुच साबित कर दिया कि जब देश के आम इंसान को सही तकनीक और पंख मिलते हैं, तो वह पूरी दुनिया में अपनी नई पहचान बना लेता है।
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