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Patna : बिहार लोक प्रशासन एवं ग्रामीण विकास संस्थान यानी बिपार्ड में अधिकारियों को दिए जाने वाले मानदेय को लेकर मचे घमासान पर अब संस्थान ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। पिछले कुछ दिनों से मीडिया और सोशल मीडिया पर यह चर्चा जोरों पर थी कि बिपार्ड में अफसरों को ट्रेनिंग के नाम पर गलत तरीके से मोटी रकम बांटी गई है। इस पूरे मामले पर संस्थान ने रविवार को विस्तृत बयान जारी कर सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। संस्थान का साफ कहना है कि हाल ही में प्रसारित खबरें आधी-अधूरी और भ्रामक हैं। संस्थान ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया है कि किसी भी अधिकारी या ट्रेनर को बिना क्लास लिए या तय नियम से ज्यादा एक पैसे का भी भुगतान नहीं किया गया है। पूरी व्यवस्था तय नियमों के तहत ऑनलाइन और पारदर्शी तरीके से चलाई जा रही है।
जितने घंटे क्लास, केवल उतने का ही ऑनलाइन भुगतान
बिपार्ड प्रबंधन ने स्पष्ट किया कि संस्थान में मानदेय भुगतान की एक सख्त और तय व्यवस्था है। यहां आने वाले ट्रेनर को उनकी योग्यता, पद और पे-लेवल के हिसाब से पहले से तय सरकारी दरों पर ही पैसा मिलता है। भुगतान का सीधा नियम यह है कि ट्रेनर ने हकीकत में कितने क्लास लिए हैं। जितने क्लास लिए जाते हैं, उसी के हिसाब से ऑनलाइन खाते में सीधे राशि भेजी जाती है।
संस्थान ने यह भी कहा कि ऐसा सोचना पूरी तरह गलत है कि किसी अधिकारी को घर बैठे या तय क्लास से अधिक का मानदेय थमा दिया गया। पिछले कुछ वर्षों में बिपार्ड में काफी बड़े पैमाने पर नए अधिकारियों और कर्मचारियों के प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए गए हैं। स्वाभाविक रूप से जब प्रोग्राम ज्यादा होंगे और क्लास की संख्या बढ़ेगी, तो कई अनुभवी अधिकारियों और विषय विशेषज्ञों को पढ़ाने के लिए बुलाया जाएगा। जब वे मेहनत करेंगे और समय देंगे, तो सरकारी नियमों के दायरे में उन्हें मानदेय भी मिलेगा। इसे किसी तरह की गड़बड़ी के रूप में देखना पूरी तरह से अनुचित है।
साल 2023 से 2025 तक का पाई-पाई का रिकॉर्ड मौजूद
विवाद को तूल पकड़ता देख बिपार्ड ने अपने पास सुरक्षित सरकारी रिकॉर्ड का हवाला दिया है। संस्थान का कहना है कि वर्ष 2023 से 2025 के बीच जितने भी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए, उन सबका एक-एक दस्तावेज विभाग के पास सुरक्षित है। किस तारीख को कौन सा कार्यक्रम हुआ, किस अफसर या विशेषज्ञ ने कौन सा सत्र लिया और उसके बदले उन्हें कितना भुगतान किया गया, इसका पूरा लेखा-जोखा फाइलों और कंप्यूटर सिस्टम में दर्ज है।
संस्थान के अनुसार, अगर कोई इन आंकड़ों की जांच करना चाहे तो आसानी से दूध का दूध और पानी का पानी हो सकता है। रिकॉर्ड के सत्यापन से साफ पता चलता है कि हर भुगतान के पीछे असली क्लास का आधार है। कागजों में हेराफेरी का कोई सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि पूरी प्रक्रिया निर्धारित ऑडिट और विभागीय नियमों के तहत पूरी की जाती है। बिना जमीनी हकीकत जाने और बिना आधिकारिक रिकॉर्ड देखे सिर्फ कयासों के आधार पर खबरें चलाई जा रही हैं, जिससे संस्थान की साख पर असर पड़ता है।
किताबी ज्ञान नहीं, काम का तजुर्बा सिखाने के लिए बुलाते हैं सीनियर अफसर
अधिकारियों को ट्रेनिंग में बुलाने के पीछे की वजह बताते हुए संस्थान ने कहा कि नए प्रशासनिक अधिकारियों को सिर्फ किताबों से काम सिखाना मुमकिन नहीं है। फील्ड में जाकर आम जनता की समस्याओं को कैसे सुलझाना है, सरकारी नियमों को व्यवहार में कैसे लागू करना है और जमीनी स्तर पर आने वाली अड़चनों से कैसे निपटना है, यह बात केवल वही सिखा सकता है जिसने खुद सालों तक फील्ड में काम किया हो। इसी सोच के तहत अनुभवी प्रशासनिक अधिकारियों को बतौर गेस्ट फैकल्टी बुलाया जाता है, ताकि वे अपने बरसों के तजुर्बे को नए अफसरों के साथ साझा कर सकें।
इसके साथ ही पर्सनालिटी डेवलपमेंट, बातचीत की कला और लीडरशिप क्वालिटी जैसे विषयों के लिए प्राइवेट सेक्टर के जाने-माने जानकारों की मदद ली जाती है। वहीं, सरकारी नियमों, वित्तीय प्रावधानों और सचिवालय कार्यप्रणाली के लिए सीनियर अधिकारियों की क्लास लगाई जाती है। संस्थान ने दोहराया कि वह अपने प्रशिक्षण की गुणवत्ता और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है और भविष्य में भी नियमों के तहत ही सारे काम किए जाएंगे।
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