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Ranchi : आंधी-तूफान आते ही ट्रांसफॉर्मर उड़ जाना या ट्रिपिंग से घंटों बत्ती गुल रहना अब शायद पुराने दिनों की बात बनने जा रही है। सोचिए, एक ऐसा बिजली का नेटवर्क जो किसी खराबी के आने से पहले ही उसका अंदाजा लगा ले, खुद तय करे कि लोड कहां डायवर्ट करना है और बिना किसी मानवीय दखल के फॉल्ट ठीक कर दे। सुनने में यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म की बात लग सकती है, लेकिन राजधानी रांची के IIIT यानी भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान के क्लासरूम और लैब में पिछले पांच दिनों तक ठीक इसी भविष्य को जमीन पर उतारने का खाका खींचा जा रहा था। 21 से 25 सितंबर तक चले इस विशेष शॉर्ट टर्म कोर्स में देशभर से आए इंजीनियर, रिसर्चर और प्रोफेसर इसी बात पर माथापच्ची कर रहे थे कि हमारे पारंपरिक बिजली ग्रिड को ‘स्मार्ट और समझदार’ कैसे बनाया जाए।

कमरे में बैठकर स्क्रीन पर दिखा पतरातू का लोड और AI का कमाल
इस वर्कशॉप का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि बात केवल बोर्ड पर फॉर्मूले लिखने तक सीमित नहीं रही। देश के टॉप IIT, NIT और बड़ी बिजली कंपनियों से जुड़े 15 तकनीकी दिग्गजों ने हाइब्रिड तरीके से जुड़कर सीधे प्रैक्टिकल फंडे समझाए। उन्होंने बताया कि कैसे इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और स्मार्ट सेंसर के जरिए ग्रिड का हर एक हिस्सा आपस में बातचीत कर सकता है। अगर किसी इलाके में सौर ऊर्जा की पैदावार अचानक बढ़ जाती है, तो सिस्टम खुद तय करेगा कि उस बिजली को कहां खपाना है। कोर्स में भाग ले रहे 52 शोधार्थियों और युवा इंजीनियरों के लिए यह समझना बिल्कुल नया अनुभव था कि कैसे एक कोड लिखकर भारी-भरकम ग्रिड के ब्लैकआउट को सेकंड के सौवें हिस्से में टाला जा सकता है।

जब पतरातू पावर स्टेशन के कंट्रोल रूम में गूंजे सवाल
किताबी थ्योरी को असली दुनिया की कसौटी पर परखने के लिए इन प्रतिभागियों को पतरातू स्थित जेएसईबी पावर सब-स्टेशन ले जाया गया। 24 सितंबर को हुई इस फील्ड विजिट ने पूरी क्लासरूम पढ़ाई का नजरिया ही बदल दिया। विशालकाय ट्रांसफॉर्मरों, गूंजती मशीनों और कंट्रोल रूम में जलती-बुझती बत्तियों के बीच जब प्रतिभागियों ने अपनी आंखों से ग्रिड का संचालन देखा, तब उन्हें समझ आया कि कागजों पर दिखने वाली तकनीक जमीन पर कितनी पेचीदा होती है। वहां मौजूद इंजीनियरों से प्रतिभागियों ने पूछा कि असल जिंदगी में जब ग्रिड फेल होता है, तो किस तरह के फैसले तुरंत लेने पड़ते हैं और वहां ऑटोमेशन किस तरह मददगार बन सकता है।

लैब से निकलकर सीधे समाज के काम आए रिसर्च
पूरे कार्यक्रम के केंद्र में यह सोच साफ झलकी कि नई तकनीक केवल रिसर्च पेपर्स में सिमटकर न रह जाए। IIIT रांची के निदेशक प्रो. राजीव श्रीवास्तव ने सत्र के दौरान साफ कहा कि प्रयोगशाला की खोज और बाजार की जरूरत के बीच जो दूरी है, उसे पाटना सबसे जरूरी है। उनके मुताबिक जब कॉलेज और बिजली कंपनियां एक टेबल पर बैठकर काम करेंगी, तभी किसी आम नागरिक के घर तक बिना रुकावट और सस्ती बिजली पहुंच सकेगी।

कार्यक्रम के समन्वयक डॉ. प्रियब्रत गरणायक, डॉ. रवि शंकर और डॉ. अभिनव कुमार के नेतृत्व में हुए इस मंथन से साफ है कि आने वाले समय में बिजली के खंभे और तार सिर्फ करंट ढोने का जरिया नहीं रहेंगे, बल्कि वे एक दिमागदार नेटवर्क की तरह काम करेंगे जो हर सेकंड खुद को अपडेट करता रहेगा।
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