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Ramgarh (Dharmendra Pradhan) : शहर की भागदौड़ और रोजमर्रा की आपाधापी के बीच इन दिनों रामगढ़ जिमखाना क्लब रिसॉर्ट का नजारा पूरी तरह बदला हुआ है। पंडाल में कदम रखते ही हवा में घुली अगरबत्ती की खुशबू, कानों में गूंजती करताल की आवाज और हर जुबान पर राधे-राधे का नाम एक अलग ही दुनिया का अहसास कराता है। रुंगटा परिवार की ओर से सजे श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन माहौल ऐसा बन गया, मानो कुछ घंटों के लिए समूचा रामगढ़ ही कान्हा की नगरी वृंदावन में तब्दील हो गया हो।
आस्था का ऐसा ज्वार, जहां हर कोई कान्हा के रंग में रंगा नजर आया
कथा के दूसरे दिन दोपहर ढलते ही पंडाल में श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। देखते ही देखते पूरा परिसर खचाखच भर गया। रुंगटा परिवार के सदस्यों ने जब भक्ति भाव से व्यासपीठ की आरती उतारी और विश्वविख्यात भागवत मर्मज्ञ आचार्य मृदुल कृष्ण गोस्वामी जी का माल्यार्पण कर अभिनंदन किया, तो पूरा हाल जयकारों से गूंज उठा। रांची से आए परिजनों ने पुष्पगुच्छ देकर महाराज श्री का सत्कार किया और बदले में पूज्य आचार्य श्री ने सभी को अंगवस्त्र ओढ़ाकर अपना स्नेह और आशीर्वाद दिया। मंच से लेकर सामने बैठी संगत तक, हर चेहरा भक्ति के गहरे रंग में डूबा हुआ साफ नजर आ रहा था।
स्वर्ग में सिर्फ पुण्य का हिसाब है, पर वृंदावन में बरसता है प्रेम
व्यासपीठ पर विराजमान आचार्य मृदुल कृष्ण गोस्वामी जी ने जब अपनी चिर-परिचित सहज और मीठी शैली में बात शुरू की, तो पंडाल में मौजूद हर शख्स मानो सांस थामकर सुनने लगा। उन्होंने बहुत सरल शब्दों में जीवन का मर्म समझाया कि हम अक्सर दान-पुण्य और बड़े-बड़े यज्ञों को ही सब कुछ मान लेते हैं। बेशक ये नेक काम हैं, लेकिन भागवत कथा का आयोजन और श्रवण उस सबसे ऊपर का सत्कर्म है, क्योंकि यह इंसान को सीधे परमात्मा के करीब ले जाता है। उन्होंने वृंदावन का जिक्र छेड़ते हुए कहा कि स्वर्ग लोक तो महज हमारे पुण्यों के हिसाब-किताब की जगह है, असली अनमोल खजाना तो वृंदावन में है, जहां किसी फल की नहीं बल्कि साक्षात ईश्वर के निश्चल प्रेम की प्राप्ति होती है। वृंदावन भोग की नहीं, प्रभु की अनूठी लीला भूमि है जहां आज भी भक्ति साक्षात महसूस होती है।
सांसारिक होशियारियां छोड़िए, तभी रीझेंगे बांके बिहारी
कथा को आगे बढ़ाते हुए आचार्य श्री ने नारद जी और भक्ति-वैराग्य के प्रसंग को आज के इंसानी स्वभाव से जोड़कर समझाया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि दुनियादारी में हम जितनी मर्जी चतुराई दिखा लें, लेकिन भगवान के दरबार में चालाकी का सिक्का नहीं चलता। अगर सचमुच बिहारी जी की कृपा पानी है, तो दिल का सारा छल-कपट बाहर छोड़कर बिल्कुल बालक की तरह निष्कपट भाव से प्रभु के चरणों में समर्पित होना पड़ेगा। मन, वाणी और आचरण की इसी पवित्रता से ईश्वर मिलते हैं।
भजनों की तान पर झूम उठी संगत, महाप्रसाद संग संपन्न हुआ दूसरा दिन
सत्संग की यह गंभीर धारा देखते ही देखते उत्सव में बदल गई जब आचार्य श्री ने अपने सुरीले कंठ से “श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी” और “राधे-राधे बोलो चले आएंगे बिहारी” की तान छेड़ी। संगीत की धुन और भजनों के बोल ऐसे असरदार थे कि आगे बैठे बुजुर्ग हों या पीछे खड़ी युवा पीढ़ी, हर कोई अपनी सुधबुध भूलकर अपनी जगह पर खड़े होकर झूमने लगा। इसी बीच मंच पर जब मनमोहक झांकियां प्रस्तुत हुईं, तो कई श्रद्धालुओं की आंखें भावविह्वल होकर छलक आईं। शाम ढलने पर बांके बिहारी जी की आरती के साथ इस दिव्य आयोजन के दूसरे दिन का विश्राम हुआ। गर्मजोशी से बंटे महाप्रसाद को ग्रहण करते हुए आलोक रूंगटा ने सभी नगरवासियों से न्योता दिया कि आने वाले दिनों में भी रोज दोपहर तीन से शाम सात बजे तक इस ज्ञान गंगा में डुबकी लगाने सपरिवार जरूर पधारें।
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