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Patna : गांव की गलियों में सुबह-सुबह जब अमूमन चूल्हे की आग सुलगाने और घर के चौके-बर्तन की चिंता होती थी, वहीं अब एक नई खनक सुनाई दे रही है। यह खनक है बिहार की ग्रामीण महिलाओं के बढ़ते कदमों की, जो अब सिर्फ घर संभालने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गांव की अर्थव्यवस्था की पतवार भी थाम रही हैं। बिहार में महिलाओं को आर्थिक रूप से अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए एक बड़ा बदलाव ज़मीन पर उतर रहा है। राज्य की लगभग 7 हजार जीविका दीदियों ने पशुपालन और डेयरी के कारोबार की ऐसी कमान संभाली है कि वे अब खुद तो आत्मनिर्भर बन ही चुकी हैं, अपने गांव की दूसरी महिलाओं के लिए भी ‘मास्टर गुरु’ बन गई हैं।
जब दो सरकारी ताकतों ने मिलाया हाथ
कहते हैं कि अगर नीयत सही हो और योजना सटीक, तो बदलाव आते देर नहीं लगती। कुछ ऐसा ही हुआ जब राज्य के ग्रामीण विकास विभाग (जीविका) और डेयरी व पशु संसाधन विभाग (कॉम्फेड) ने आपस में हाथ मिलाया। मकसद एक ही था कि ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ कागजों से निकलकर सीधे गांव की महिलाओं के घर-आंगन तक पहुंचे। योजना की रफ्तार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य की 1.5 करोड़ से ज्यादा महिलाओं के खातों में तय सहायता राशि की पहली किस्त पहुंच चुकी है। लेकिन सिर्फ बैंक खाते में पैसे आ जाना ही काफी नहीं था। असली चुनौती थी कि इस पैसे से कमाई का पक्का जरिया कैसे बनाया जाए? बस, यहीं से शुरू हुई ट्रेनिंग की नई कहानी।
जिले-जिले में सजी क्लास, तैयार हुईं ‘पशु सखियां’
कॉम्फेड ने राज्य के हर जिले में खास ट्रेनिंग कैंप लगाए। यहां जीविका दीदियों को कोई किताबी ज्ञान नहीं दिया गया, बल्कि सीधे व्यावहारिक तरीके सिखाए गए। पशुओं की सही देखभाल कैसे हो, उनका दूध उत्पादन कैसे बढ़े, बीमारियों से बचाव कैसे किया जाए और दूध की मार्केटिंग कैसे हो, इन सब पर खुलकर बात हुई। ट्रेनिंग पूरी करके जब ये दीदियां अपने गांव लौटीं, तो उनका नाम और रुतबा दोनों बदल चुका था। अब वे गांव में साधारण महिला नहीं, बल्कि ‘पशु सखी’ के नाम से पहचानी जा रही हैं।
अब गांव-गांव जमेगी चौपाल
ट्रेनिंग लेकर लौटीं इन पशु सखियों को अब एक नई जिम्मेदारी दी गई है। ब्लॉक प्रोजेक्ट मैनेजरों (BPM) ने साफ कह दिया है कि बिना कोई वक्त गंवाए, ये दीदियां अब अपने-अपने गांवों में स्वयं सहायता समूहों (SHG) की अन्य महिलाओं को हुनर सिखाना शुरू करें। गांवों में महिलाओं को एक जगह जुटाने की जिम्मेदारी ग्राम संगठन के प्रेरकों की होगी। चौपाल जमेगी, पशुपालन की नई तकनीकों पर बातें होंगी और किस दीदी ने क्या नया सीखा, इसका पूरा ब्योरा ग्राम संगठन के रजिस्टर में लिखा जाएगा। यानी पूरी पारदर्शिता और गंभीरता के साथ यह काम आगे बढ़ेगा।
दायरा सिर्फ दूध तक नहीं, बकरी और भेड़ पालन भी शामिल
इस पहल की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह सिर्फ गाय और भैंस के दूध कारोबार तक सिमटी हुई नहीं है। गांव में कई ऐसी गरीब महिलाएं भी हैं जो भेड़, बकरी या सूअर पालन करके अपना घर चलाती हैं। पशु सखियां अब ऐसी महिलाओं को भी अलग से ट्रेनिंग देंगी। इन छोटे पशुओं के रखरखाव, उनके चारे और देखभाल की ट्रेनिंग के लिए अलग से क्लास लगाई जाएगी और उसका रिकॉर्ड भी अलग रखा जाएगा। कुल मिलाकर, बिहार के गांवों में अब एक ऐसा माहौल बन रहा है, जहां महिलाएं घर के काम के साथ-साथ पशुपालन के जरिए अपनी और अपने परिवार की तकदीर खुद लिख रही हैं।
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