अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :
Pakur (Jaydev Kumar) : सुबह की हल्की धुंध में जब बेलडीहा गांव जागता है, तो तालाब के किनारे सबसे पहले जो हलचल दिखती है, वह दुलारस किस्कू की मेहनत की पहचान बन चुकी है। पानी में उतरती सैकड़ों बतखें, उनकी आवाज़ें और किनारे खड़ी दुलारस की मुस्कान, यह सिर्फ एक रोज़मर्रा का दृश्य नहीं है, बल्कि संघर्ष से आत्मनिर्भरता तक की एक जीवंत कहानी है।
जहां से शुरू हुआ सफर
पाकुड़ जिले के हिरणपुर प्रखंड के इस छोटे से गांव में दुलारस किस्कू का जीवन कभी बहुत सीमित साधनों में सिमटा हुआ था। परिवार की आमदनी पारंपरिक खेती पर निर्भर थी, जो मुश्किल से साल भर का खर्च निकाल पाती थी। कई बार हालात ऐसे हो जाते थे कि बच्चों की पढ़ाई और घर की जरूरतों के बीच चुनाव करना पड़ता था। इन्हीं परिस्थितियों ने दुलारस को कुछ अलग करने के लिए प्रेरित किया।
सखी मंडल ने दी हिम्मत
दुलारस किस्कू मसीह सखी मंडल से जुड़ीं। शुरुआत में उन्होंने ऋण लेकर 50 बतख, 50 मुर्गी और 2 बकरियों के साथ काम शुरू किया। यह फैसला आसान नहीं था। गांव में कई लोग संशय में थे कि एक महिला अकेले पशुपालन कैसे संभालेगी। लेकिन दुलारस के मन में एक ही बात थी कि कोशिश किए बिना हार नहीं माननी है।

मेहनत, सीख और धैर्य
शुरुआती दिनों में बाजार तक पहुंच, चारे की व्यवस्था और बीमारी जैसी समस्याएं सामने आईं। कई बार नुकसान का डर भी लगा, लेकिन दुलारस ने सीखना नहीं छोड़ा। पहली बिक्री से जो थोड़ी बहुत आमदनी हुई, उसी ने उन्हें आगे बढ़ने का भरोसा दिया। उन्होंने सखी मंडल से दोबारा 20 हजार रुपये का ऋण लिया और 500 बतखों का पालन शुरू किया।
नए साल की सौगात
नवंबर में चूजों का पालन शुरू हुआ। दिन-रात की देखभाल और नियमित मेहनत रंग लाई। नववर्ष 2026 के मौके पर दुलारस ने 400 बतख 500 रुपये प्रति बतख की दर से बेचीं। दो लाख रुपये की यह आय उनके लिए सिर्फ एक आंकड़ा नहीं थी, बल्कि वर्षों की चिंता से मिली राहत थी। वह पल उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट बन गया।
परिवार का साथ बना ताकत
इस पूरे सफर में उनके पति मनु बेसरा हर कदम पर साथ खड़े रहे। अस्थायी ढांचे से शुरू हुआ यह काम अब स्थायी तालाब तक पहुंच चुका है। पति का सहयोग और परिवार का भरोसा दुलारस के लिए सबसे बड़ी ताकत बना।
आय के नए रास्ते
आज दुलारस किस्कू के पास 500 बतख और 400 मुर्गियां हैं। दिसंबर में मुर्गियों की बिक्री से उन्हें करीब 80 हजार रुपये की अतिरिक्त आय हुई। इसके साथ ही वह मछली पालन भी कर रही हैं, जिससे उनकी आमदनी के और स्रोत तैयार हो रहे हैं।
बदलता जीवन, नए सपने
आमदनी बढ़ने के साथ दुलारस का जीवन भी बदल रहा है। पक्के मकान का सपना अब हकीकत की ओर बढ़ रहा है। बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ रहे हैं और घर में भविष्य को लेकर अब चिंता नहीं, बल्कि योजनाएं बनती हैं।
संस्थागत सहयोग की अहम भूमिका
दुलारस बताती हैं कि इस बदलाव में उन्हें ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत कार्यरत झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी का मार्गदर्शन और सहयोग मिला। प्रशिक्षण और समय पर ऋण सुविधा ने उनके आत्मविश्वास को मजबूत किया।
अन्य महिलाओं के लिए मिसाल
आज बेलडीहा गांव और आसपास की महिलाएं दुलारस किस्कू को एक उदाहरण के रूप में देखती हैं। वह अक्सर कहती हैं कि अगर उन्हें मौका मिला, तो वह दूसरी महिलाओं को भी बतख और पशुपालन के लिए प्रेरित करेंगी।
इसे भी पढ़ें : दीदी बाड़ी से सड़क तक, लिट्टीपाड़ा में मनरेगा कार्यों की हुई सख्त जांच

