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Bhagalpur : मोबाइल फोन की घंटी बजते ही विभूति सिंह दिल की धड़कन तेज हो जाती है। यह घंटी किसी परिचित की नहीं, बल्कि उस डर की है जो पिछले कुछ दिनों से उनके और उनके परिवार के साथ जी रहा है। राष्ट्रीय मानवाधिकार एवं आरटीआई जागरूकता संगठन भारत के मीडिया प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय सचिव विभूति सिंह को लगातार फोन पर जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं। यह धमकी सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार की शांति और भरोसे को भी झकझोर रही है।
सहमे हुए घर के बच्चे, बुजुर्ग चिंतित
विभूति सिंह बताते हैं कि धमकियों के बाद घर का माहौल पूरी तरह बदल गया है। बच्चे सहमे हुए हैं, परिवार के बुजुर्ग चिंतित रहते हैं और हर अनजान नंबर एक नए खतरे की आशंका पैदा करता है। उनका कहना है कि मानवाधिकार और पत्रकारिता का रास्ता कठिन होता है, लेकिन इस हद तक जाने की उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी।
संगठन ने की कार्रवाई और सुरक्षा की मांग
मामले की जानकारी मिलते ही संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सह संस्थापक सांगेश कुमार भाटी सक्रिय हुए। उन्होंने इसे सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि मानवाधिकार से जुड़े लोगों को डराने की कोशिश बताया। भाटी ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उपमुख्यमंत्री सह गृहमंत्री सम्राट चौधरी, बिहार के डीजीपी, भागलपुर के डीएम, एसएसपी, आईजी और लोदीपुर व गोराडीह थाना को लिखित शिकायत भेजकर आरोपी पर सख्त कार्रवाई और विभूति सिंह की सुरक्षा की मांग की।
एक नाम, एक नंबर और कई सवाल
शिकायत में जिस व्यक्ति का नाम सामने आया है, वह गोराडीह थाना क्षेत्र के मोहनपुर का निवासी डिकेश यादव बताया गया है। सवाल यह है कि आखिर कौन सी बात किसी को इस कदर आक्रोशित कर सकती है कि वह जान से मारने की धमकी देने लगे। क्या यह किसी खबर से उपजी नाराजगी है या सच के उजागर होने की बेचैनी?
निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकारिता की कीमत
विभूति सिंह बताते हैं कि वे संगठन के कार्यों के साथ साथ एक हिंदी नेशनल न्यूज चैनल में निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकारिता करते हैं और सामाजिक मुद्दों पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि वे बिना पुष्टि किसी भी खबर का प्रसारण नहीं करते। संभव है कि किसी रिपोर्ट से कोई आहत हुआ हो, लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछना और सच दिखाना अपराध नहीं हो सकता।
समर्थन की आवाजें
संगठन के बिहार प्रदेश अध्यक्ष जितेंद्र कुमार, युवा प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष धीरज कुमार सहित कई पदाधिकारियों ने फोन कर विभूति सिंह को हौसला दिया। यह समर्थन सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि उस भरोसे का प्रतीक है कि वे इस मुश्किल समय में अकेले नहीं हैं।
इंतजार न्याय का
आज विभूति सिंह और उनका परिवार एक ही उम्मीद के सहारे है कि कानून उन्हें सुरक्षा देगा। अगर मानवाधिकार और सच की बात करने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हुई, तो सवाल उठाने वाली आवाजें धीरे धीरे खामोश होती चली जाएंगी। अब इस मामले में सभी की निगाहें पुलिस की कार्रवाई पर टिकी हैं।
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