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Pakur : चंडालमारा गांव की वह सड़क आज लोगों की आवाजाही आसान बनाती है, लेकिन इसी सड़क के किनारे एक किसान की जिंदगी सालों से ठहरी हुई है। किसान गणेश मंडल की पैतृक रैयती जमीन सड़क चौड़ीकरण के लिए आठ साल पहले अधिग्रहित कर ली गई, पर आज तक उन्हें उसका पूरा मुआवजा नहीं मिल पाया है।
सड़क बनी, पर किसान की राह मुश्किल
साल 2018 में पथ निर्माण विभाग ने सड़क चौड़ीकरण और विकास का काम शुरू किया। विकास की इस तस्वीर में गणेश मंडल ने भी अपनी जमीन दी। उन्हें भरोसा था कि तय प्रक्रिया के बाद मुआवजा मिलेगा और उसी पैसे से वे अपने परिवार की आगे की जरूरतें पूरी करेंगे। 20 अगस्त 2018 को महेशपुर अंचल कार्यालय द्वारा अमीन नापी कर अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी हुई। कागजों में सब कुछ दर्ज हो गया, जमीन भी स्थायी रूप से ले ली गई, लेकिन मुआवजे का इंतजार वहीं से शुरू हुआ जो आज तक खत्म नहीं हो सका।
कागज चले, फाइलें बढ़ीं, पर पैसा नहीं पहुंचा
नापी के दौरान सड़क निर्माण के लिए उनकी पैतृक भूमि का एक बड़ा हिस्सा लिया गया। इसके बाद अंचल कार्यालय महेशपुर ने जिला भू-अर्जन पदाधिकारी, पाकुड़ को सभी जरूरी दस्तावेज और प्रस्ताव भेज दिए। कागजी कार्रवाई पूरी होने के बावजूद भुगतान की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी। गणेश मंडल बताते हैं कि हर कुछ महीने में वे किसी न किसी कार्यालय के चक्कर लगाते रहे। कभी कहा गया फाइल लंबित है, कभी प्रक्रिया चल रही है। साल दर साल बीतते गए, पर समाधान नहीं मिला।
जमीन गई, आमदनी भी चली गई
गणेश मंडल के लिए यह जमीन सिर्फ जमीन नहीं थी। यही उनकी खेती का आधार थी, यही परिवार की आमदनी का साधन। जमीन अधिग्रहण के बाद खेती कम हो गई और आय पर सीधा असर पड़ा। वे कहते हैं कि बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और खेती से जुड़ी जरूरतें सब कुछ मुआवजे की आस में टलती रहीं। आर्थिक तंगी ने परिवार को धीरे-धीरे जकड़ लिया।
उम्मीद अब भी बाकी है
थक हार कर किसान ने अब पाकुड़ डीसी मनीष कुमार को आवेदन देकर न्याय की गुहार लगाई है। आवेदन में उन्होंने साफ लिखा है कि यह उनकी पैतृक रैयती भूमि थी और मुआवजा न मिलना उनके साथ अन्याय है। उन्होंने प्रशासन से मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए शीघ्र भुगतान कराने की मांग की है।
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