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Pakur (Jaydev Kumar) : सुबह की ठंडी हवा में जब कोर्ट परिसर के दरवाजे खुले, तो माहौल कुछ अलग था। काली कोट की गंभीरता के बीच आज उम्मीद, चेतना और बदलाव के कदम दिखाई दे रहे थे। हाथों में संदेश थे, आंखों में संकल्प और होंठों पर एक ही नारा “जीवन को हां कहो, नशे को ना कहो।” यह कोई सामान्य रैली नहीं थी। यह एक ऐसी पहल थी, जहां कानून की किताबों से बाहर निकलकर न्याय खुद सड़क पर लोगों से संवाद करने आया था।
हरी झंडी और एक मजबूत संदेश
प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश दिवाकर पांडे जैसे ही हरी झंडी दिखाते हैं, वॉकथॉन आगे बढ़ती है। यह केवल एक संकेत नहीं था, बल्कि उस सोच का उद्घोष था कि समाज को नशे के अंधेरे से बाहर निकालना केवल प्रशासन की नहीं, हर जागरूक नागरिक की जिम्मेदारी है। न्यायालय परिसर से डॉ भीमराव अंबेडकर चौक तक जाती यह पदयात्रा, फिर वापस न्यायालय लौटती है, लेकिन अपने साथ कई सवाल और कई जवाब छोड़ जाती है।
नशा, जो परिवारों को चुपचाप तोड़ देता है
रैली में शामिल अधिकारी, कर्मचारी, अधिवक्ता और पैरा लीगल वॉलिंटियर्स जब आम लोगों से नजरें मिलाते हैं, तो संदेश और गहरा हो जाता है। नशा केवल एक आदत नहीं, बल्कि एक ऐसी लत है जो शरीर, मन और परिवार तीनों को तोड़ देती है। प्रधान जिला जज का कहना था कि अगर इंसान नशे को अपने जीवन से अलग कर ले, तो तनाव खुद-ब-खुद कम होने लगता है और जीवन में स्थिरता आती है। उनका संदेश सरल था, लेकिन असरदार।
सिर्फ एक दिन नहीं, एक सप्ताह का संकल्प
जिला विधिक सेवा प्राधिकार की सचिव रूपा बंदना किरो बताती हैं कि यह अभियान केवल एक दिन तक सीमित नहीं है। 5 जनवरी से 12 जनवरी तक पाकुड़ जिले के शहरी और ग्रामीण इलाकों में लगातार जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएंगे। इन कार्यक्रमों के जरिए लोगों को बताया जाएगा कि नशा किस तरह धीरे-धीरे मानसिक संतुलन, शारीरिक स्वास्थ्य और सामाजिक रिश्तों को कमजोर करता है।
जब न्यायिक अधिकारी भी बनते हैं समाज के साथी
वॉकथॉन में फैमिली कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश, अपर सत्र न्यायाधीश, मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, स्थायी लोक अदालत के अध्यक्ष, अनुमंडल न्यायिक दंडाधिकारी सहित बड़ी संख्या में न्यायिक अधिकारी शामिल रहे। यह दृश्य आम लोगों के लिए खास था। आमतौर पर जिन चेहरों को वे अदालत में देखते हैं, वही आज सड़क पर उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे।
कदम छोटे थे, लेकिन असर बड़ा
पाकुड़ की सड़कों पर चली यह वॉकथॉन भले ही कुछ किलोमीटर की रही हो, लेकिन इसका असर कहीं गहरा था। यह संदेश साफ था कि नशा छोड़ना कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है। जब कानून, समाज और इंसान एक साथ चलते हैं, तब बदलाव सिर्फ नारा नहीं रह जाता, वह हकीकत बनता है।
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