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Bhagalpur (Pirpainti) : शनिवार की सुबह थी। पीरपैंती के दानापुर मस्जिद परिसर में रोज़ की तरह सन्नाटा नहीं था। आज यहां कुछ अलग होने वाला था। दूर-दूर से लोग धीरे-धीरे जमा हो रहे थे। किसी के हाथ में पर्ची थी, तो कोई बच्चे को गोद में लिए खड़ा था। वजह थी — अदाणी फाउंडेशन का निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर, जो इस गांव के लिए किसी त्योहार से कम नहीं था।
“शहर जाना मुश्किल है, यहां इलाज मिल गया”
65 साल के एक शख्स पिछले कई महीनों से घुटनों के दर्द से परेशान थे। चलना-फिरना मुश्किल हो गया था। डॉक्टर दिखाने के लिए भागलपुर जाना पड़ता, लेकिन किराया और दवा का खर्च उनके बस से बाहर था। शिविर में जांच कराने के बाद जब उन्हें मुफ्त दवा मिली, तो आंखों में राहत झलक उठी। उन्होंने कहा, “सोचा नहीं था कि गांव में ही डॉक्टर बैठेंगे। आज बहुत बड़ा सहारा मिल गया।”

महिलाओं और बच्चों के चेहरे पर दिखी राहत
शिविर में सबसे ज्यादा भीड़ महिलाओं और बच्चों की थी। 28 साल की एक महिला अपने तीन साल के बेटे को लेकर आई थीं। बच्चा कई दिनों से बुखार से परेशान था। डॉक्टर ने जांच की, दवा दी और सही देखभाल की सलाह भी दी। महिला बोलीं, “पैसे नहीं होते तो इलाज टालना पड़ता है। आज बेटे को दवा मिली, मन को बहुत सुकून मिला।” मां के चेहरे की मुस्कान ही इस शिविर की सबसे बड़ी सफलता थी।
जब डॉक्टर बने गांव के अपने लोग
शिविर में मौजूद डॉक्टर सिर्फ मरीज नहीं देख रहे थे, बल्कि हर किसी से अपनापन से बात कर रहे थे। किसी को खाने की सलाह दी, तो किसी को साफ-सफाई पर ध्यान देने को कहा। एक बुजुर्ग महिला को समझाते हुए डॉक्टर बोले, “दवा के साथ पानी ज्यादा पीजिए, और समय पर आराम कीजिए।” ऐसा लग रहा था जैसे ये डॉक्टर नहीं, बल्कि गांव के अपने लोग हों।

सेवा से जुड़ी संवेदना
अदाणी फाउंडेशन की यह पहल सिर्फ इलाज तक सीमित नहीं थी। यह उन लोगों तक पहुंचने की कोशिश थी, जो अक्सर व्यवस्था से दूर रह जाते हैं। यहां सिर्फ बीमारियां नहीं सुनी जा रही थीं, बल्कि लोगों की परेशानियां, मजबूरियां और संघर्ष भी सुने जा रहे थे।
एक स्वयंसेवक ने कहा, “जब किसी को इलाज मिलने के बाद मुस्कराते देखते हैं, तो सारी थकान खत्म हो जाती है।”
गांव वालों की नजर में ‘अपना’ बना फाउंडेशन
ग्रामीणों का कहना है कि अदाणी फाउंडेशन ने धीरे-धीरे गांव में अपनी पहचान बनाई है। कभी स्कूल में मदद, कभी साफ-सफाई अभियान, तो कभी रोजगार से जुड़ी ट्रेनिंग… हर पहल ने लोगों का भरोसा बढ़ाया है। अब लोग कहते हैं, “ये लोग सिर्फ कंपनी नहीं, हमारे सुख-दुख के साथी हैं।”
एक दिन, जो कई जिंदगियों में उम्मीद छोड़ गया
शाम होते-होते शिविर खत्म हो गया। लोग दवा की पुड़िया और चेहरे पर संतोष लेकर घर लौटने लगे। परिसर फिर से शांत हो गया, लेकिन उस दिन की यादें लोगों के मन में रह गईं।
यह सिर्फ एक स्वास्थ्य शिविर नहीं था। यह उन लोगों के लिए राहत थी,
जिनके लिए इलाज सपना बन चुका था। यह भरोसा था कि कोई है, जो उनके बारे में सोचता है।
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