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Pakur (Jaydev Kumar) : भोरे-भोर धूप की पहली किरण के साथ जब पाकुड़ की संकरी गलियों में बच्चे स्कूल की ओर बढ़ते हैं और महिलाएं रोज़मर्रा के काम में जुट जाती हैं, तो अब उनकी बातचीत में बीमारी का डर कम और बदलाव की बातें ज़्यादा सुनाई देती हैं। कभी कालाजार से दहशत में जीने वाले परिवार अब राहत की सांस ले रहे हैं।
मरीजों की जिंदगी में आई नई उम्मीद
कसबा प्रखंड की एक महिला सावित्री देवी बताती हैं… “कुछ साल पहले मेरे घर के दो लोग कालाजार की चपेट में आ गए थे। डर ऐसा था कि रातों की नींद उड़ गई थी। पर अब स्वास्थ्यकर्मी घर-घर आकर जांच करते हैं और दवा भी उपलब्ध कराते हैं। हम सबको भरोसा है कि अब ये बीमारी हमारे गाँव से जाएगी।” उनकी बातों में वही विश्वास झलकता है, जो प्रोजेक्ट ‘जागृति’ और ‘विवेक’ ने लोगों में जगाया है।
क्या कहते हैं DC मनीष कुमार…
पाकुड़ के DC मनीष कुमार का कहना है कि हर महीने 24 तारीख को जिले के सभी प्रखंडों में रक्तदान शिविर आयोजित किए जाते हैं। साथ ही 500 से अधिक टीबी मरीजों को जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने गोद लिया है, ताकि उन्हें दवा और देखभाल नियमित मिल सके। इस पहल से न सिर्फ बीमारों को सहारा मिला है, बल्कि समाज में सेवा की भावना भी मजबूत हुई है।

राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान
फाइलेरिया उन्मूलन अभियान में बेहतरीन प्रदर्शन कर पाकुड़ ने पूरे राज्य में दूसरा स्थान हासिल किया। पिछले एक वर्ष में जिले के छह नवाचारी कार्यक्रमों को राष्ट्रीय मंच पर सराहना मिली। रांची के रेडिसन होटल में हुए सम्मेलन में जब विशेषज्ञों ने पाकुड़ मॉडल की चर्चा की, तो स्थानीय स्वास्थ्यकर्मी गर्व से मुस्कुरा उठे।
फ्रंटलाइन वर्कर्स की मेहनत
मिनी हेल्थ सेंटर में तैनात CHO अंजलि कुमारी कहती हैं… हमारी टीम गाँव-गाँव जाकर जागरूकता फैलाती है। पहले लोग डरते थे कि कालाजार का इलाज मुश्किल है, लेकिन अब वे दवा के लिए खुद आगे आते हैं। यह बदलाव हमें आगे बढ़ने की ताकत देता है।
अगले साल कम हो जायेगा कालाजार का लोड : डीसी
DC मनीष कुमार ने भरोसा जताया है कि अगले साल तक जिले का कालाजार लोड 0.5% से नीचे आ जाएगा। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की जिंदगी से जुड़ी उम्मीद है।
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