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Patna : अगर सब कुछ योजना के मुताबिक हुआ तो आने वाले वर्षों में बिहार की पहचान सिर्फ खेती, उद्योग और ऐतिहासिक धरोहरों तक सीमित नहीं रहेगी। राज्य उन चुनिंदा प्रदेशों में शामिल हो सकता है, जहां परमाणु ऊर्जा से बड़े पैमाने पर बिजली पैदा होगी। सरकार ने इस दिशा में कदम तेज कर दिए हैं। CS यानी मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत की अध्यक्षता में हुई हाई लेवल समीक्षा बैठक में चार संभावित जगहों पर बनने वाले परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की तैयारियों का बारीकी से जायजा लिया गया और अधिकारियों को साफ संदेश दिया गया कि अब फाइलें नहीं, काम तेजी से आगे बढ़ना चाहिए।
सरकार की नजर ऐसे बिजली उत्पादन पर है जो दिन-रात बिना रुकावट चलता रहे और भविष्य की बढ़ती जरूरतों को पूरा कर सके। इसी सोच के साथ बांका, नवादा और सीवान में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं पर काम आगे बढ़ाया जा रहा है।
चार जगहों पर चल रही है सबसे ज्यादा चर्चा
फिलहाल सरकार ने चार संभावित स्थलों पर अपनी नजर टिकाई है। इनमें बांका का भितिया, बांका का शंभूगंज, सीवान का दरौली और नवादा का रजौली शामिल हैं। हर जगह 2×700 मेगावाट क्षमता वाले आधुनिक प्रेशराइज्ड हैवी वॉटर रिएक्टर लगाने का प्रस्ताव है।
अगर इनमें से एक भी परियोजना पूरी तरह तैयार हो जाती है तो बिहार की बिजली उत्पादन क्षमता में बड़ा इजाफा होगा। उद्योगों को लगातार बिजली मिलेगी, बिजली खरीद पर निर्भरता घटेगी और लंबे समय में ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी।
एक प्लांट के लिए चाहिए 1000 एकड़ जमीन और करोड़ों लीटर पानी
परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाना आसान काम नहीं होता। इसके लिए मजबूत तकनीकी व्यवस्था के साथ बड़ी मात्रा में जमीन और पानी भी चाहिए। बैठक में बताया गया कि एक परियोजना के लिए करीब 1000 एकड़ जमीन की जरूरत होगी। वहीं प्लांट की कूलिंग व्यवस्था बनाए रखने के लिए हर साल लगभग 80 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी चाहिए होगा।
हालांकि अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि इस्तेमाल के बाद करीब 22 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी पूरी तरह विकिरण मुक्त होकर दोबारा जल स्रोत में छोड़ा जाएगा। इस पानी का उपयोग सिंचाई और दूसरे कामों में भी किया जा सकेगा। यानी पर्यावरणीय मानकों का पूरा ध्यान रखा जाएगा।
भितिया साइट सबसे आगे, कई मंजूरियां मिल चुकी हैं
चारों प्रस्तावित जगहों में सबसे ज्यादा प्रगति बांका के भितिया में दिखाई दे रही है। यहां बदुआ जलाशय से पानी उपलब्ध कराने के लिए जल संसाधन विभाग की अनापत्ति मिल चुकी है। वन विभाग ने भी जरूरी मंजूरी दे दी है। अब स्थानीय स्तर पर जो छोटी-मोटी अड़चनें बची हैं, उन्हें जल्द दूर करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि परियोजना अगले चरण में पहुंच सके।
रजौली को लगा झटका, जमीन तकनीकी जांच में फेल
नवादा के रजौली से इस बैठक में एक ऐसी खबर भी सामने आई जिसने परियोजना की दिशा बदल दी। एनटीपीसी ने बताया कि प्रस्तावित स्थल के आसपास बड़ी भ्रंश रेखा मौजूद है। आसान भाषा में कहें तो यह ऐसा इलाका है जहां भूकंपीय गतिविधियों का खतरा ज्यादा माना जाता है। परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड के सुरक्षा मानकों के मुताबिक ऐसी जगह परमाणु संयंत्र नहीं लगाया जा सकता। इसी वजह से रजौली साइट को फिलहाल उपयुक्त नहीं माना गया है।
दरौली और शंभूगंज में अब शुरू होगी असली तैयारी
सीवान के दरौली और बांका के शंभूगंज में अब शुरुआती तकनीकी जांच शुरू करने की तैयारी है। मुख्य सचिव ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि दोनों जगहों के लिए पानी उपलब्ध कराने का सशर्त आश्वासन जल्द लिया जाए। इसके बाद भू-तकनीकी जांच, बोरहोल ड्रिलिंग और बाकी शुरुआती सर्वे शुरू किए जाएं, ताकि आगे की प्रक्रिया समय पर पूरी हो सके।
एक साल में पूरा करना होगा बड़ा होमवर्क
मुख्य सचिव ने साफ शब्दों में कहा कि अगले 12 महीनों के भीतर सभी जरूरी प्रक्रियाएं पूरी हो जानी चाहिए। इसमें जमीन से जुड़े कागजी काम, पानी का आवंटन, बोरहोल ड्रिलिंग की अनुमति और दूसरी नियामकीय मंजूरियां शामिल हैं। सरकार की कोशिश है कि इन तैयारियों के आधार पर केंद्र सरकार से जल्द सैद्धांतिक मंजूरी मिल जाए और बिहार की पहली परमाणु ऊर्जा परियोजना का रास्ता साफ हो सके।
क्यों खास है यह परियोजना?
बिहार लंबे समय से अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा दूसरे राज्यों से खरीदकर बिजली उपलब्ध कराता रहा है। ऐसे में अगर राज्य में परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित होते हैं तो सिर्फ बिजली उत्पादन ही नहीं बढ़ेगा, बल्कि औद्योगिक निवेश, रोजगार और ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। यही वजह है कि सरकार इस परियोजना को भविष्य की सबसे अहम ऊर्जा योजनाओं में शामिल कर तेजी से आगे बढ़ाना चाहती है।
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