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Pakur (Jaydev Kumar) : पाकुड़ रेलवे साइडिंग पर आज भी वही सन्नाटा पसरा है। जहां रोज पत्थरों से भरे रेलवे रैक गूंजते थे, वहां अब खाली डिब्बे खड़े हैं। धूप में खामोश खड़े ये रैक सिर्फ कारोबार के ठहराव की कहानी नहीं कहते, बल्कि उन हजारों मजदूरों की चिंता भी बयां करते हैं, जिनकी रोजी-रोटी इसी लोडिंग पर टिकी है। रेलवे सुविधाओं की मांग को लेकर पत्थर व्यवसायियों का आंदोलन लगातार दूसरे दिन भी जारी है। पत्थर क्वारी ओनर एसोसिएशन के आह्वान पर पाकुड़ और साहिबगंज जिले में रेलवे के जरिए होने वाली पत्थर लोडिंग पूरी तरह बंद है।
रोज कमाने, रोज खाने वाले मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित
साइडिंग पर काम करने वाले मजदूरों के लिए हर दिन का काम जरूरी होता है। लोडिंग बंद होने से मजदूरी भी बंद हो गई है। कई मजदूर सुबह काम की उम्मीद में साइडिंग पहुंचे, लेकिन खाली रैक देखकर लौट गए। मजदूरों का कहना है कि आंदोलन जरूरी है, लेकिन इसका असर सबसे पहले उनके घर के चूल्हे पर पड़ता है।
सुविधाओं की कमी से नाराज व्यवसायी
पत्थर व्यवसायियों का गुस्सा सिर्फ कारोबार तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि वे हर साल रेलवे को करोड़ों रुपये का राजस्व देते हैं, फिर भी क्षेत्र को बुनियादी रेल सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। न पटना के लिए सीधी ट्रेन है, न दिल्ली के लिए। कई एक्सप्रेस ट्रेनें यहां से गुजर जाती हैं, लेकिन ठहराव नहीं होता।
पहले ही दी गई थी चेतावनी
हाल ही में झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय प्रवक्ता पंकज मिश्रा ने पाकुड़ और साहिबगंज के पत्थर व्यवसायियों के साथ बैठक की थी। बैठक में साफ कहा गया था कि अगर रेलवे ने मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो 16 जनवरी से पत्थर लोडिंग बंद कर दी जाएगी। अब उसी फैसले का असर जमीन पर साफ दिख रहा है।
रेलवे और सरकार को रोजाना करोड़ों का नुकसान
पत्थर लोडिंग बंद होने से रेलवे को प्रतिदिन करीब दो करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। राज्य सरकार को भी हर दिन लगभग 40 लाख रुपये के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ रहा है। कारोबार ठप होने से ट्रांसपोर्टर, लोडिंग स्टाफ और छोटे दुकानदार भी प्रभावित हो रहे हैं।
खाली साइडिंग बता रही है आंदोलन की गंभीरता
अपर साइडिंग, लोअर साइडिंग, बाहरग्राम और तिलभिट्टा रेलवे साइडिंग में रैक खाली खड़े हैं। आम दिनों में जहां गतिविधियों की भरमार रहती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है। यह तस्वीरें बताती हैं कि आंदोलन सिर्फ चेतावनी नहीं, बल्कि पूरी तैयारी के साथ किया गया कदम है।
मजबूरी में उठाया गया कदम
पत्थर स्टाफ सुशील कुमार सिन्हा कहते हैं कि रेलवे से कोई सुविधा नहीं मिलती। लोडिंग बंद होने से मजदूरों को भी परेशानी हो रही है, लेकिन मजबूरी में यह फैसला लेना पड़ा। वहीं पत्थर व्यवसायी गोपी बत्रा का कहना है कि हम टकराव नहीं चाहते, सिर्फ सुविधाएं चाहते हैं। जब तक हमारी मांगों पर ठोस फैसला नहीं होगा, तब तक रेलवे रैक में पत्थर की लोडिंग शुरू नहीं की जाएगी।
लंबा चला आंदोलन तो बढ़ेगी मुश्किल
पाकुड़ से रोजाना 5 से 6 रेलवे रैक पत्थर लोड होकर देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजे जाते थे। आंदोलन अगर लंबा चला, तो इसका असर रेलवे, राज्य सरकार और सबसे ज्यादा स्थानीय मजदूरों पर पड़ेगा। अब सभी की नजर रेलवे प्रशासन पर टिकी है।
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