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Home » उपनिवेशवाद का इतिहास- कुछ पहलू |
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उपनिवेशवाद का इतिहास- कुछ पहलू |

June 7, 2020No Comments3 Mins Read
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– के. एन. गोविन्दाचार्य

विश्व में ई. 1500 से प्रारंभ हुए उपनिवेशवाद की अमानुषिकता के लक्षण थे : लूट, हथियारवाद, शोषण, अत्याचार, लूट नवदास प्रथा का उभार| अमेरिका, अफ्रिका मे भीषण नरसंहार हुआ| यूरोपीय कबीलावाद का पुनरोदय हुआ| उत्पादन फैक्ट्री मे, फैक्ट्री के लिये शहर की बसाहट, स्लम जीवन, उभरा टेक्नोलॉजी का प्रभाव बढ़ने से अर्थ व्यवस्था एवं यूरोपीय राजनीति का स्वरूप बदला| 1550 से 1650 उपनिवेशवादियों की आपसी लड़ाई के साथ-साथ व्यापार से राजनीति की ओर बढ़ाव हुआ| 1650-1850 भारत मे लूट, यूरोप का घर भरना, इंग्लैंड वर्चस्व की ओर औद्योगिक क्रान्ति मे भारत की लूट का योगदान, ये सारे परिणाम थे| 1850 से आगे टिके रहने मे दिक्कतें और यूरोप मे स्पर्धा, तनाव बढा| भारत सर्वाधिक दबाव मे 1750-1850 तक आया| भाषा-भूषा, भोजन-भवन, भेषज-भजन में भी प्रभाव बढ़ा| यूरोप में तनाव और सर्वाधिकार की होड़ मची|
इंग्लैंड का अंधानुकरण भारत में हर तरह से बढ़ा, प्रतिरोध भी सामान्य जन की ओर से बढ़ा| प्रगति, विकास, आधुनिकता की परिभाषाएँ विकृत हो गई| शिक्षा, संस्कार की व्यवस्था पर भारी हमला हुआ| आत्म विस्मृति का भयंकर दौर आया|
राष्ट्रीय समाज ने प्रतिकार भी किया| यूरोपीय लोगों द्वारा शोषण के हर संभव उपाय मे टेक्नोलॉजी उपयोगी रही| यों तो भारत पर पड़े प्रभाव दर्दनाक थे फिर भी उत्तर दक्षिण अमेरिका, अफ्रिका पूर्व एशियाई देश आदि में तो अकल्पनीय अति हुई|
आपसी स्पर्धा के फलस्वरूप इस सिलसिले का रूपांतरण प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध मे हुआ| द्वितीय विश्वयुद्ध के फल के रूप में उपनिवेशवाद को नया स्वरुप प्राप्त होना स्वाभाविक था|
विशेष चिन्ता यूरोप, अमेरिका मे यह बनी कि भारत अंग्रेज छोड़ें फिर भी यूरोपीय परिधि मे भारत बना रहे ऐसी चिंता, व्यवस्था की जाय|
भारत की तुलना मे दुनिया के अन्य भाग में दुर्दशा ज्यादा ही हुई| भारत मे प्रतिरोध भी सदैव रहा, अंग्रेजों को भयभीत करता रहा| उत्तर दक्षिण अमेरिका में यूरोपीय नरसंहार की क्रूरता, मानवीय इतिहास मे सबसे घिनौनी है| अफ्रिका से लोगों को जिस प्रकार अपने घरों से उजाड़कर उपनिवेशों मे भेजा गया, उसका आड़ना तथाकथित सभ्य यूरोप, अमेरिका को दिखाया जाना चाहिये|
उपनिवेशवादी ताकतों ने धीरे-धीरे पिछले 100 वर्षों में सरकारवाद और बाजारवाद को वर्चस्व स्थापना के हथियार के नाते अपनाया है| सरकारवाद, सामरिक शक्ति पर आधारित है और बाजारवाद, आर्थिक शक्ति पर आधारित है| ये दोनों ही उपकरण तकनीकी के माध्यम से वर्चस्व स्थापना के लिये प्रत्यक्ष, परोक्ष रूप से सहायक है| इसमे छल, धोखा, कपट, अनैतिकता और “विषकुंभम् पयोमुखम” की कूटनीति काम आ रही है|
भारत का सामान्य जन विश्व कल्याण के भाव से पूरित है| वर्चस्व स्थापन, एवं शक्ति पर आधारित यूरोपीय मानस के समझने में देर लगाता है यह तथ्य चिन्तनीय है| सबको अपने जैसा समझना, भोलापन है, इसे सद्गुण विकृति कहते हैं|
दो पहलू आत्मविस्मृति एवं सद्गुण विकृति, नव उपनिवेशवाद से मुकाबला करने में बाधक है| सत्य से रूबरू होना जरुरी है| पिछले 500 वर्षों की गतिशीलता के बारे में आगे चर्चा होगी|

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