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Ranchi : ऊंची दीवारें, भारी-भरकम फाटक और सख्त पहरा… जेल का नाम सुनते ही अक्सर यही तस्वीर आंखों में उभरती है। लेकिन इन्हीं दीवारों के भीतर ऐसे भी लोग रहते हैं, जो गलती के बोझ के साथ-साथ समाज की उपेक्षा, तिरस्कार और भेदभाव का डर भी ढोते हैं। खासकर तब, जब सवाल जाति आधारित भेदभाव का हो। इसी संवेदनशील मुद्दे को केंद्र में रखकर डालसा की बोर्ड-ऑफ-विजिटर्स टीम ने 16 फरवरी को रांची सेंट्रल जेल यानी राजधानी की ‘लाल कोठी’ का निरीक्षण किया। एक ऐसा दौरा, जिसमें कानून से ज्यादा इंसानियत बोल रही थी।
बराबरी की कसौटी पर जेल व्यवस्था
यह निरीक्षण झालसा के न्यायामूर्ति-सह-कार्यपालक अध्यक्ष सुजीत नारायण प्रसाद के निर्देश पर हुआ। मकसद बिल्कुल साफ था… क्या जेल में किसी बंदी को उसकी जाति के आधार पर अलग रखा जा रहा है? क्या किसी से उसकी पहचान के कारण अलग काम लिया जा रहा है? जेल के अलग-अलग वार्डों में जाकर, बंदियों से बातचीत कर, उनकी दिनचर्या को समझकर बोर्ड-ऑफ-विजिटर्स ने इन सवालों के जवाब तलाशे।
बंदियों की जुबानी… ‘यहां हम सब एक जैसे हैं’
निरीक्षण के दौरान कई बंदियों ने खुलकर बात की। किसी ने कहा, “गलती हमसे हुई होगी, लेकिन यहां हमारे साथ इंसान जैसा व्यवहार होता है।” किसी ने हौले से बोला, “यहां हमें जाति से नहीं, नियम से देखा जाता है।” इन बातचीतों के बाद टीम के सामने यह बात साफ हुई कि जाति के आधार पर भेदभाव का कोई ठोस मामला सामने नहीं आया। यह निष्कर्ष सिर्फ कागज़ी जांच नहीं, बल्कि मानवीय संवाद के जरिए निकला।
थाली में सम्मान, माहौल में स्वच्छता
जेल में बंद इंसान के लिए खाना सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि सम्मान का सवाल भी होता है। टीम ने रसोई, भोजन सामग्री और साफ-सफाई की व्यवस्था का बारीकी से जायजा लिया। निर्देश साफ थे… भोजन साफ और पौष्टिक हो। रसोई और बैरक की सफाई में कोई समझौता न हो। क्योंकि बीमार शरीर में न सुधार संभव है, न आत्ममंथन।
सलाखों के बीच किताबों की दुनिया
निरीक्षण के दौरान जेल की लाइब्रेरी भी देखी गई। किताबें यहां सिर्फ समय काटने का जरिया नहीं, बल्कि उम्मीद का दरवाजा हैं। टीम ने इस बात पर जोर दिया कि पढ़ने-लिखने की सुविधा और बेहतर की जाए, ताकि बंदी अपने भीतर बदलाव की जमीन तैयार कर सकें।
महिला बंदी और उनके बच्चे… सबसे नाजुक सवाल
जेल की सबसे संवेदनशील तस्वीर वहां दिखी, जहां महिला बंदियों के साथ उनके छोटे-छोटे बच्चे रहते हैं। इन मासूमों की कोई गलती नहीं, फिर भी उनकी दुनिया चारदीवारी के भीतर सिमटी है। बोर्ड-ऑफ-विजिटर्स ने साफ निर्देश दिया कि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्था मजबूत हो। उनका बचपन जेल की दीवारों में कैद न हो। यह निर्देश कानून से ज्यादा संवेदना की भाषा में था।
सेहत बंदी की सबसे बड़ी जरूरत
डिस्पेंसरी निरीक्षण के दौरान यह बात उभरकर सामने आई कि नियमित स्वास्थ्य जांच बेहद जरूरी है। डालसा सचिव राकेश रौशन ने जेल प्रशासन को निर्देश दिए कि बंदियों और उनके बच्चों की निरंतर मेडिकल जांच हो, ताकि बीमारी बढ़ने से पहले ही रोकी जा सके।
जेल सजा नहीं, सुधार का मौका
यह निरीक्षण सिर्फ एक औपचारिक दौरा नहीं था। यह उस सोच का प्रतिबिंब था, जिसमें जेल को सुधार गृह माना जाता है, न कि सिर्फ सजा की जगह। बोर्ड-ऑफ-विजिटर्स का संदेश साफ था… कानून का पालन जरूरी है, लेकिन इंसानियत उससे भी जरूरी।
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