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Ranchi : झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन के सिर से आज मां का साया उठ गया। उनकी मां रूपी सोरेन ने बुधवार को रांची के हिल व्यू अस्पताल में अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से दिल से जुड़ी बीमारियों से जूझ रही थीं। हालत बिगड़ने पर उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था, लेकिन डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बाद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका। दोपहर से ही सीएम हेमंत सोरेन अस्पताल में मौजूद थे और मां की बिगड़ती सेहत के बीच बेचैन नजर आ रहे थे। रूपी सोरेन का जाना सिर्फ एक परिवार के लिए मां का बिछड़ना नहीं है, बल्कि यह उस मजबूत आधार का शांत हो जाना है जिसने झारखंड आंदोलन के सबसे कठिन दौर को अपनी आंखों से देखा और सहा।
हैदराबाद से लौटीं और अचानक बिगड़ने लगी तबीयत
रूपी सोरेन पिछले कुछ समय से लगातार अस्वस्थ चल रही थीं। बेहतर इलाज के लिए उन्हें हाल ही में हैदराबाद के एक बड़े अस्पताल ले जाया गया था। वहां से कुछ सुधार के बाद वे रांची लौटी थीं, लेकिन अचानक उनकी तबीयत फिर बिगड़ गई। घर पर डॉक्टरों ने उनकी जांच की, पर जब सांस लेने में बहुत ज्यादा तकलीफ होने लगी तो बिना देर किए उन्हें हिल व्यू अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों की टीम लगातार उनकी निगरानी कर रही थी। बुधवार को जैसे ही खबर फैली कि उनकी स्थिति नाजुक है, हेमंत सोरेन के मंत्रिमंडल के कई सहयोगी, पार्टी के विधायक और करीबी लोग अस्पताल पहुंचने लगे थे।
जब पति जंगलों में लड़े, तब घर और उम्मीद दोनों को संभाले रखा
रूपी सोरेन की कहानी सिर्फ एक मुख्यमंत्री की मां होने तक सीमित नहीं है। वे झारखंड के जननायक शिबू सोरेन यानी गुरुजी की जीवनसंगिनी थीं। जब शिबू सोरेन झारखंड के हक के लिए जंगलों, पहाड़ों और सुदूर गांवों में घूम-घूम कर आंदोलन की अलख जगा रहे थे, तब रूपी सोरेन ने घर की दहलीज पर खड़े होकर परिवार को संभाला था। पुलिस की दबिश, अनिश्चितता और संघर्ष के उन काले दिनों में वे गुरुजी की सबसे बड़ी ताकत बनी रहीं। उन्होंने कभी मंचों से भाषण नहीं दिए, लेकिन आंदोलन की हर तपिश को उन्होंने खामोशी से अपने भीतर समेटे रखा।
तीन महीने पहले व्हीलचेयर पर बैठी मां को देख भावुक हुआ था देश
महज तीन महीने पहले की बात है, जब देश की राजधानी में राष्ट्रपति भवन का भव्य दरबार हॉल एक भावुक पल का गवाह बना था। झारखंड आंदोलन के महानायक शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म भूषण दिया गया था। उस दिन सम्मान ग्रहण करने के लिए कोई और नहीं, बल्कि रूपी सोरेन खुद पहुंची थीं। वे व्हीलचेयर पर थीं, उम्र और बीमारी की लकीरें चेहरे पर साफ थीं, लेकिन आंखों में अपने जीवनसाथी के संघर्ष का गौरव था। जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रोटोकॉल से आगे बढ़कर झुकते हुए उनके हाथों में पदक सौंपा, तो पूरा हॉल देर तक तालियों से गूंजता रहा था। वह तस्वीर आज हर किसी की आंखों में तैर रही है।
शोक में डूबा राजनीतिक गलियारा, नेताओं ने कहा- अपूरणीय क्षति
रूपी सोरेन के निधन की खबर आते ही राज्य में शोक की लहर दौड़ गई। पक्ष हो या विपक्ष, हर दल के नेता इस दुख की घड़ी में मुख्यमंत्री और उनके परिवार के साथ खड़े नजर आए। जमशेदपुर पश्चिमी के विधायक सरयू राय ने सोशल मीडिया पर लिखा कि उन्होंने एक भरा-पूरा जीवन जिया और अपने पीछे हजारों लोगों के लिए मां जैसा स्नेह छोड़ गईं। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने गहरा दुख जताते हुए कहा कि रूपी सोरेन के जाने की खबर से मन बेहद भारी है। उन्होंने आंदोलन के दौर की यादों को साझा करते हुए मरांग बुरु से दिवंगत आत्मा की शांति की प्रार्थना की और अंतिम जोहार कहा। आज पूरा झारखंड उस मां को याद कर रहा है, जिसने संघर्ष के बीच एक मजबूत परिवार और एक पूरा राज्य बनते देखा।
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